नारी सशक्तिकरण के प्रेरणा देश के प्रथम शिक्षिका सावित्री बाई फुले : डॉ. गीता देवी हिमधर

नारी सशक्तिकरण के प्रेरणा देश के प्रथम शिक्षिका सावित्री बाई फुले : डॉ. गीता देवी हिमधर   
   सावित्रीबाई फुले के कार्य और विचार आधुनिक नारी सशक्तिकरण के लिए एक मजबूत आधार है। उन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में जो प्रयास किए  आज भी प्रासंगिक है। उनके द्वारा स्थापित प्रथम महिला विद्यालय भारतीय समाज में नारी शिक्षा का मार्गदर्शन बना। आधुनिक समय में नारी सशक्तिकरण के मुद्दे जैसे लैंगिक समानता महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए उनके कार्य प्रेरणा के स्रोत है। "शिक्षा ही महिलाओं को आत्मनिर्भर बना सकती है " यह उनके विचार आज भी महिला सशक्तिकरण के आंदोलन का मूल सिद्धांत है। 
    सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव नामक गांव में हुआ था। माता लक्ष्मीबाई पिता खंडोंजी थे। सावित्री बाई का विवाह 9 वर्ष की आयु में  शिक्षा के प्रबल समर्थक और समाज सुधारक ज्योति राव फुले के साथ हुआ। उनके पति ज्योति राव ने उन्हें पढ़ने लिखने की प्रेरणा दी। ज्योतिबा ने सावित्रीबाई को उस समय पढ़ाया जब महिलाओं की शिक्षा को पाप माना जाता था। समाज के विरोध और कठिनाइयों के बावजूद सावित्रीबाई ने खुद को शिक्षित किया और बाद में पुणे के शिक्षण संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त कर नारी शक्ति का प्रतीक और भारत की पहली महिला शिक्षिका बनी।
    सावित्रीबाई फुले महिलाओं की शिक्षा के लिए मार्ग प्रशस्त किया। और अपने पति ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर सन 1848 में पुणे में पहली महिला विद्यालय स्थापित किया,जो महिलाओं को आत्मनिर्भर और शिक्षित बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम था। जब ओ पढ़ाने के लिए विद्यालय जाती थीं तब रास्ते में लोगों के द्वारा उनके ऊपर कीचड़,कंकड़,गोबर आदि फेंककर अपमानित किया जाता था,फिर भी माता सावित्री बाई फुले हार नहीं मानी। वे अपने थैला में एक अलग से साड़ी लेकर चलती थीं और विद्यालय पहुंच कर साड़ी बदल कर शिक्षा प्रदान करती थीं। विद्यालय में भी तोड़ फोड़ कर उसे जान से मारने की धमकी देने पर भी वे निडर होकर डटी रहीं।धीरे धीरे पढ़ने वाले बालिकाओं और महिलाओं की संख्या बढ़ने लगी और विरोध करने वाले भी अपने बेटियों को विद्यालय भेजने लगे।और उन्होंने अनेकों विद्यालय खोले। सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा के साथ-साथ बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं को चुनौती दी और विधवाओं के पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया। उनके पति ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर उन्होंने शिक्षा और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास किए। उन्होंने छुआछूत और जातिगत भेदभाव को चुनौती देते हुए सत्यशोधक समाज की स्थापना की।और देश में अकाल पड़ा तो फुले दंपत्ति ने लोगों के लिए भोजन का इंतजाम किया और तत्कालीन मजिस्ट्रेट के ऊपर दबाव बनाकर जमाखोरी का माल जप्त करवा कर पूरे की जनता के सहयोगी बने। पति के मृत्यु के पश्चात भी उन्होंने सत्यशोधक समाज का सफल नेतृत्व करती रही। उन्होंने गर्भवती विधवाओं और परित्यकता महिलाओं के लिए पुणे में एक बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की ताकि वे अपने बच्चों को सुरक्षित रूप से जन्म दे सके। यह कदम उस समय के समाज में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए एक क्रांतिकारी प्रयास था। उनका जीवन समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव छुआछूत और लैंगिक असमानता जैसी किरीतियों के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने इन सामाजिक बुराइयों को जड़ से खत्म करने के लिए शिक्षा और जागरूकता को सबसे प्रभावी माध्यम बनाया। उनकी विचार केवल महिलाओं को ही नहीं बल्कि पूरे समाज को प्रभावित किया। उनके प्रयासों के परिणाम स्वरूप आज महिलाएं हर क्षेत्र में समानता और सम्मान के साथ आगे बढ़ रही है। सावित्रीबाई के विचार नारी सशक्तिकरण़ के लिए प्रेरणा स्रोत है। उन्होंने यह सिखाया की नारी सशक्तिकरण केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि सामूहिक प्रयासों से संभव है। उनका यह विचार आज भी सामाजिक संगठनों और सरकार द्वारा चलाए जा रहे महिला विकास कार्यक्रमों में स्पष्ट रूप से झलकता है।
    सावित्रीबाई का योगदान यह सिखाता है कि नारी सशक्तिकरण केवल अधिकार प्राप्ति तक सीमित नहीं है बल्कि आत्मनिर्भरता, आत्म सम्मान और समाज में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से पूर्ण होता है। आधुनिक नारी आंदोलन उनकी सोच और कार्यों से प्रेरणा लेकर निरंतर प्रगति कर रहा है।
  सावित्रीबाई फुले शिक्षिका और समाजसेवी होने के साथ-साथ कवित्री भी थी उनकी छह रचनाएं प्रकाशित हुई । वह शिक्षा को सबसे बड़ी दौलत मानती थी और भगवान बुद्ध के शिक्षा और आदर्शों की अनुयायी थी। उनकी रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों का खात्मा दलित उद्धार के कार्य, समाज में व्याप्त पाखंड का भंडाफोड़ करने जैसे तथ्य पर उनके शिक्षा उनके रचनाओं में मिलती है। अपने पति के निधन होने पर उन्होंने अपने पति के चिता को खुद मुखाग्नि देकर एक मिसाल कायम की।सावित्री बाई फुले 66 वर्ष की आयु में भी समाज सेवा में लगी रही। वह दिन-रात प्लेग रोगियों की सेवा करती थी। एक बच्चे का सेवा करते-करते  खुद प्लेग से ग्रसित हो गई और 10 मार्च 1897 को देश की महान शिक्षिका, समाज सेवी, विचारक, और कवयित्री का दुखद अंत हो गया। ऐसे महान विभूति को सादर नमन।


        डॉ. गीता देवी हिमधर 
    राज्यपाल पुरस्कृत 
           व्याख्याता 
  शा. उ. मा. वि.
      फरसवानी 
जिला कोरबा छ. ग.

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने