जीवन की कुण्डलियाँ

जीवन की कुण्डलियाँ 
देख जगत का हाल, आज तो ईश्वर भी शर्मिंदा।
अनुशीलन कर लें जनाब, नहीं इंसानियत जिंदा।।

रोज़ बदलता है लोगों का, अब चरित्र का ग्राफ ।
कैसे भला सुलभ हो पाये, परम पिता का साथ ।।

समता अमृत और विषमता, विष ही है फैलाती ।
चुगली करना पाप, परन्तु दुनियाँ कहाँ अधाती ।।

अब तो सौ सौ बार झूठ का लेते लोग सहारा ।
रखता जो ईमान जिगर में फिरता जग में मारा।।

सोचा नहीं था हो जाएगा, लोगो का यह स्तर ।
छल फ़रेब से हो गई स्तिथि, अब बद से बद्तर।।

पूर्वज हम लोगों के रखते, हक हकूक व ईमान।
अब तो व्याप्त हुए सर्वत्र ही बेशुमार बेईमान ।।

जीवन में शुचिता न दीखती, बाहर से हम न्यारे।
कथनी करनी एक नहीं है, दिखते हम सब प्यारे ।।

हम सुधरेंगे तभी बनेगा, अपना आकर्षक परिवेश ।
हम सुधरेंगे जग सुधरेगा, तभी बनेगा सुन्दर देश ।।

है उदारता उत्तम गुण, तो क्षमा अतुलनीय बल ।
बने कृतज्ञ व क्षमाशील तब,बन्धुत्व बने सम्बल ।।

रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा”विज्ञ”
              सुन्दरपुर वाराणसी-o५

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