बात - चीत : डॉ. सत्य प्रकाश
सोशल मीडिया के माध्यम से विभिन्न वैचारिक समुदायों (जातिगत, धर्मगत, राजनीतिक सरोकार, विकासवादी, पुरातन चिंतन, वैश्विक परिदृश्य अथवा अन्य अन्य ) में चल रही आपसी बात चीत और समाज को सामने से समझने की वकालत को लेकर हम सभी बहुत आशान्वित हैं। सोशल मीडिया का यही उद्देश्य होना चाहिए कि सामाजिक समानता को बनाने में यह आगे बढ़ कर अपना योगदान करे। पिछले दशक की यात्रा (2016-2026) में सोशल मीडिया का प्रादुर्भाव कई प्लेटफार्म के रूप में हुआ है और आज ऐसे दसों माध्यम हैं जहाँ करोङो सामाजिक लोग बात चीत में बने रहते हैं अथवा अपने घर, समाज में बैठे बैठे अपना वैचारिक समावेश कर रहे हैं। अगर एक दशक और पीछे भी देखें तो (2006-2016) के बीच ऎसी वैचारिक शक्ति अपने पास नहीं थी और उसके पिछले दशक (1996-2006) के बीच तो मुझे लगता है कि अखबार और पत्रिका के अतिरिक्त अन्य कोई तरीका नहीं था जिसके द्वारा वैचारिक आदान प्रदान संभव रहा। अधिक से अधिक वैचारिक संयोजन के पक्षधर के रूप में हम वर्तमान युग को (2016-2046) को "स्व-प्रकाशन युग" कह सकते हैं जिसके मध्य में हम खड़े हैं। आधुनिक स्मार्टफोन एप्पल के साथ 2007 में बाजार में आये और इसी ने समाज में "स्व-प्रकाशन युग" की नींव डाली। 2007 से 2013 तक स्मार्ट फोन की परिधि समाज के हर वर्ग तक जैसे जैसे हुई वैसे वैसे सामाजिक वैचारिक क्रांति ने लगभग हर बड़े निर्णय को प्रभावित करना शुरू कर दिया। 2014 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद भारत में "डिजिटल क्रांति" का आगमन हुआ जिसमें "सस्ते डाटा युग" के आगमन को, "मिनट-मिनट की बात" के "टाटा युग" की तरह देखा जा सकता है। मात्र दो साल में ही सामाजिक परिवर्तन हेतु "सामाजिक बात-चीत के समावेश" को बढ़ाते हुए कई प्रयोगों के द्वारा "मन की बात" को "जनजन की बात" में तब्दील कर दिया अन्यथा 2016 में आई नोटबंदी का प्रभाव सामाजिक विमर्श के दायरे द्वारा संभाला नहीं जा सकता था। अर्थात जो सामाजिक-आर्थिक "सर्जिकल स्ट्राइक" नोटबंदी के समय हुई वह "स्व-प्रकाशन" युग के प्रारंभिक चरण में आई और उसका नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष दोनों सोशल मीडिया पर भरपूर चर्चा का का विषय बना और यही कारण था कि सरकार के उस तथाकथित स्ट्राइक को इतनी बड़े जनमानस ने कड़वी गोली समझ कर निगल लिया।
स्व-प्रकाशन युग (2016-2046) में आज 2026 का पहला माह है और स्व-प्रकाशन युग के प्रथम दशक के बीतते बीतते, मात्र दस सालों में ही जैसे लगता है कि गंगा का पानी- नोटबंदी से लेकर आज तक कितने सारे सामाजिक विमर्श को हम सभी के बीच महत्वपूर्ण स्थान दे चुका है और कितने सारे विमर्श को यह समाज समय रहते अपने वैचारिक समावेश से प्रभावित कर सामाजिक परिवर्तन भी करा चुका है।
आज जब हम यह बात-चीत के महत्व को बेहतर समाज के निर्माण हेतु निर्णायक मानते हुए लेखन कर रहे हैं तब संयोग देखिये कि आज मौनी-अमावस्या भी है। बात चीत के इस युग में मौन के महत्व को भी याद करने का भाव होना चाहिए लेकिन मौन का अर्थ यह नहीं कि हमें अपने विचार को लिख कर अथवा सोच-समझ कर, थोड़ा समय लेकर आदान-प्रदान करने की छूट नहीं है। यह स्व-प्रकाशन युग की अपेक्षा है कि हम सभी वैचारिक समावेश में सह भागीदारी कर स्वस्थ समाज के निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वहन करें। हमारे एक मौन से अथवा न प्रकाश में आने से क्या होगा, इसकी कल्पना आप करके देख सकते हैं। मात्र 2016-2026 के दशक में हमने सोशल मीडिया में काम करके और संग संग हुए वैचारिक आदान प्रदान को देखते हुए यह समझा है कि "भूतो न भविष्यत" जो काम हम समाज के साथ कर पाए, वह बिना इस टेक्नोलॉजी के सदुपयोग के संभव ही नहीं था। खुद हमनें डॉ. सत्या होप टॉक के विभिन्न प्रोजेक्ट से कितना सामाजिक सरोकार स्थापित किया और इसके कितने निहितार्थ की नींव रखी, इसके बारे में यदि मैं लेखन करुँ तो अगले दस दिन तक भी लिखता रहुँ तो मैं अपनी लेखनी को विराम न दे सकूंगा और मात्र व्यक्तियों के नाम भी अंकित करने लगूं तो मैं आपको बता सकता हूँ कि वह नाम पढ़ना भी आपको बोझ लगने लगेगा क्योंकि वह असंख्य न होते हुए भी एक धारा बनेगी जो हनुमान जी की पूँछ की तरह बढ़ती जाएगी। मैं इस बात को इसलिए नहीं बता रहा कि हमनें कोई बड़ी उपलब्धि कमा ली है बल्कि हमारे कहने का अर्थ यह है कि यह सत्या होप टॉक का काम तो आपके देखते देखते ही हुआ है तो सोचना यह है कि बात-चीत के दायरे को सदुपयोग करने का कितना क्रन्तिकारी प्रयास आज स्व-प्रकाशन युग में संभव है।
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डॉ. सत्य प्रकाश
वैज्ञानिक -विचारक
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय