अंक केवल गणना के साधन ही नहीं;बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा व दिव्य संदेशों के वाहक भी : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा

अंक केवल गणना के साधन ही नहीं;बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा व दिव्य संदेशों के वाहक भी : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
हमारे आर्ष ऋषियों और मनीषियों द्वारा संख्याओं के प्रदर्शन के लिए दस अंकों वाली एक निपुण प्रणाली बहुत प्राचीन काल से विकसित की है। इसीकारण से भारतीय अंक प्रणाली संसार की सर्वाधिक प्रचलित अंक प्रणालियों में गिनी  जाती है।प्रत्येक संख्या में एक विशिष्ट ऊर्जा और गुप्त अर्थ निहित होता है।
अंक संख्याओं के गुणों, सम्बन्धों और संक्रियाओं (जोड़ घटाव गुणन फल आदि) का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं;तो वहीं उनकी कंपन व ऊर्जा के माध्यम से मानवीय स्वभाव,भाग्य और जीवन को प्रभावित करने वाले कारकों का भी अध्ययन किया जाता है।अध्यात्मिक रूप से ०-९ तक की संख्या मानवीय व आध्यात्मिक विकास,कर्म और चेतना के विभिन्न स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं ,जो हमें उच्च चेतना से जोड़ने वाले संकेतक के रूप में प्रकट होते हैं;इसकी सहायता से ज्योतिषाचार्य भविष्यवाणियाँ भी करने में सक्षम हो पाते हैं।
आइये ! अब हम अंकों के महात्म्य को समझे।
O शून्य,कर्मों से मुक्त आत्मा को दर्शाता है।ब्रह्म,पूर्ण है उसे भी शून्य से इंगित किया जाता है।शून्य में से शून्य निकालने पर शून्य ही बचता है।वही ब्रह्म का रूप है।
एक (१) समाधि,कर्म,मुक्ति,अनंतता और ईश्वर के साथ एक जुटता को दर्शाता है।यह आत्मा,एकता,नेतृत्व व भगवान के साथ एकाकार होने का प्रतीक माना जाता है।यह सूर्य ग्रह का अंक माना जाता है।सूर्य हाथों हाथ फल देता है।
दो (२) दो को,द्वैत,सन्तुलन,प्रेम व आन्तरिक ज्ञान का प्रतीक माना जाता है।यह चंद्र ग्रह का अंक समझा जाता है।
तीन (३)तीन अंक को,सृजन और चेतना के विस्तार का प्रतीक समझा जाता है।यह अंक पवित्र त्रिमूर्ति से भी घनिष्ठ रूप से जुड़ा होता है।कुछ धर्म,पृथ्वी के निर्माण में सहायक भूमि,समुद्र और वायु के त्रिमूर्ति को विशेष मानकर,जश्न भी मनाते हैं।यह गुरु का अंक होता है।
चार (४) यह अंक स्थिरता,संरचना और भौतिक दुनियाँ के साथ साथ चार दिशाओं को भी इंगित करता है।यह राहु ग्रह का अंक माना गया है।
पाँच (५) यह संख्या पंच महाभूतों को इंगित करता है और परिवर्तन का द्योतक भी माना गया है।पाँच का अंक बुध ग्रह से सम्बंधित माना गया है।
छ (६) यह संतुलन,सद्भाव और प्रेम की ऊर्जा को दर्शाता है।यह अंक शुक्र ग्रह का होता है।
सात (७) यह अंक आध्यात्मिक बोध,ज्ञान और पूर्णता के लिए प्रयोग किया जाता है।केतु ग्रह का अंक सात होता है।
आठ (८) आठ अंक आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है और यह आत्मा के आठ गुणों और अष्टांग योग को दर्शाता है।यह अंक शनि को समर्पित है;यानि शनि ग्रह का यह अंक होता है।शनि कर्म कराता है और कर्मों के अनुसार फल देता है।
नौ (९) यह अंक दुनिया भर में सबसे भाग्यशाली अंकों में से एक माना गया है;क्योंकि यह ३ के जादुई अंक का तीन गुना होता है।३,जो त्रिमूर्ति का प्रतिनिधित्व भी करता है।यदि किसी व्यक्ति का दिन बहुत अच्छा बीत रहा हो तो उसे” क्लाउड नाइन”कहते हैं।जब कोई व्यक्ति आकर्षक दिखता है,तो उसे”ड्रेस्ड टू द नाइन”भी कहते हैं।नौ को पूर्णता,अंत और एक चक्र समापन  का अंक माना जाता है।९ अंक का स्वामी ग्रह मंगल है,जो साहस,शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक होता है,जो ब्रह्माण्ड को परिभाषित करता है ।१९ की संख्या को त्रैलोक्य मोहन अंक माना जाता है।कुछ मनीषी कार्य आरम्भ करने की तारीख २२ बताते हैं कि इस तिथि पर कार्य आरम्भ करने से कार्य में सफलता अत्यधिक मिलती है।६९ की संख्या को,एक महत्वपूर्ण शुभ संख्या माना गया है,जिसमें संतुलन,सामंजस्य और स्थिरता का भाव होता है;जिसे आध्यात्मिक जागृति और ज्ञानोदय से भी जोड़ा जाता है।
हिन्दू परम्परा में कुछ अंक बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं जिसमें १०८ की संख्या है,जिसे प्राचीन काल से ऋषि महर्षि मुनि महात्मा प्रयोग  करते आ रहें हैं।यह बहुत ही चमत्कारी व अद्भुत संख्या मानी गई हैं।१०८ और १००८ इन दोनों संख्याओं को महान सन्तों या आध्यात्मिक हस्तियों के नाम के पहले लगाया जाता है जो उस संत की महिमा को बढ़ा देता है।जिसमे पूर्णता हो,जो सनातन धर्म और वेदों का ज्ञाता हो,उसके नाम के पहले १०८ व १००८ श्री लगाते हैं।जैन और बौद्ध धर्म में भी इस अंक को विशेष माना गया है।इस अंक को एक उपाधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।१०८ की संख्या को शिव अंक माना गया है,क्योंकि मुख्य शिवांगों की संख्या १०८ होती है।कुछ मनीषी कहते हैं,कि शिव की १०८ तांडव मुद्राएं होती हैं,इसीलिए रुद्राक्ष की माला में १०८ मनके होते हैं।वैष्णव धर्म में १०८ दिव्य क्षेत्रों की चर्चा होती है,जिसे दिव्य देशम कहते हैं।बौध धर्म के अनुसार मन में कुल १०८ प्रकार की भावनाएं पैदा होती हैं।मानव शरीर में कुल १०८ चक्रों का भी जिक्र कुछ विद्वान करते हैं ,जिससे शारीरिक,मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य नियंत्रित करने में मदद मिलती है।हमारे ब्रह्माण्ड में कुल २७ नक्षत्र होते हैं और प्रत्येक की ४ दिशायें मानी गई हैं,यदि इनको गुणा किया जाए तो कुल १०८ आता है, जो पूरे ब्रह्माण्ड का प्रतिनिधित्व करता है।ज्योतिष के अनुसार कुल राशियों की संख्या १२ होती है और कुल ग्रहों की संख्या ९ ,इनका यदि गुणफल प्राप्त किया जाए तो कुल १०८ ही आता है।माला का हर मोती एक नक्षत्र चरण का प्रतीक माना गया है।आयुर्वेद के अनुसार शरीर में कुल १०८ मर्म स्थान होते हैं अतः १०८ की संख्या का काफ़ी महत्व होता है।आकाश गंगा में पृथ्वी से सूर्य की दूरी सूर्य के व्यास से १०८ गुणा होती है वैसे ही चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी चाँद के व्यास से १०८ गुणा होती है।
कुछ मनीषी हिंसात्मक पापों की संख्या ३६ मानते हैं,जो मन,कर्म, वचन इन तीनों से होते हैं इनका गुणनफल भी १०८ आता है।
स्वर १६ और व्यंजन ३८ कुल मिलाकर ५४ होता है नाभि से आरम्भ होकर ओष्ठों तक यह स्वर व्यंजन आता जाता है इनका एक बार चढ़ाव दूसरी बार उतार होता है दोनों बार में १०८ की संख्या बन जाती है।इस प्रकार १०८ बार मंत्र जाप से नाभि चक्र से लेकर जिह्वा तक १०८ सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुटन हो जाता है,इसीलिए कम से कम १०८ बार मंत्रों के जाप करने का विधान बनाया गया है।वैसे भी कहते हैं,कि ध्यान,विज्ञान,ब्रह्माण्ड की जीवंत संख्या १०८ मानी गई है।कुछ प्राचीन ऋषियों का कथन है कि सिद्धों में ८ गुण,अरिहंतों में १२ गुण,उपाध्यायों में २५ गुण,साधुओं में २७ गुण और आचार्यों के ३६ गुण होते हैं,और जब इन सबको जोड़ते हैं तो १०८ की संख्या प्राप्त होती है जिसका अर्थ है कि सबसे योग्य आत्माओं की कुल १०८ विशेषताएँ होती हैं।ॐ का जाप करते समय भी १०८ बार विशेष भेदक तरंगें उत्पन्न होती हैं,जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक धातक रोगों के कारण का समूल विनाश करती हैं।
मानव जीवन में कुछ विशेष दिखने वाले नम्बर्स जैसे-११,२२,४४,शुभ माने गए हैं।मुस्लिम लोग ७८६ को बेहद शुभ मानते हैं।वहीं ११७६ हिन्दू धर्म में शुभ संख्या मानी जाती है जिससे गृह में सदैव लक्ष्मी का वास बना रहता है।
संस्कृत और विश्वास के आधार पर अलग अलग धर्मों के अनुयायियों में कुछ संख्याएं अशुभ मानी गई हैं जिसमें १३ की संख्या(विशेषकर पश्चिमी देशों में) इसे दुर्भाग्य से जोड़ कर देखा जाता है,इसीकरण ८०% इमारतों में तेरहवीं मंजिल नहीं होती।
वैश्विक अंधविश्वासों के अनुसार सबसे अशुभ संख्याएं १२,१३,१७,४२०,और ६६६ को माना जाता है।इटली में १७ की संख्या को अशुभ मानते हैं।वहीं १३ की संख्या को शुभ माना जाता है।जापानीज २५,४३,६० को अशुभ मानते हैं।चीन कोरिया जापान और ताइवान सहित कई पूर्वी एशियायी संस्कृतियों में ४ की संख्या को अशुभ और भयानक मानते हैं,जिसे टेट्रोफ़ोबिया के नाम से भी जाना जाता है।कुछ अंधविश्वासी लोगों का मानना है कि सम संख्याएं अशुभ वहीं विषम संख्याएं शुभ होती हैं।
अंत में निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि अंकों व संख्याओं को शुभ व अशुभ मानना अन्ततः व्यक्तिगत मान्यताओं और विभिन्न संस्कृतियों और परम्पराओं पर निर्भर करती है।

लेखक: कई सम्मानों से विभूषित,मोटिवेशनल स्पीकर,वरिष्ठ साहित्यकार,आल इंडिया रेडियो का नियमित वार्ताकार व पूर्व अधिकारी है।

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