सहोदर भाई ( कविता)

सहोदर भाई ( कविता)
हो नीम कितनी भी कसैली, 
बड़ी  शीतल  उसकी  छाँह। 
कितना भी हो दुश्मन भाई , 
होता भाई का दाहिना बाँह। 

प्यार  ही प्यार  बरसता था, 
हर पल सुंदर थे बचपन में। 
बहुत  सुखद यादें ताजी हैं , 
प्यार  छिपा  था अनबन में। 

चोट छोटे को लगती थी तो, 
घायल  बड़ा  हो  जाता था। 
प्रथम बड़ा आया  शिक्षा में, 
कायल छोटा  हो जाता था। 

एक  दूजे  पर  जान लुटाते, 
आपसी  प्रेम था  बेमिशाल। 
माता-पिता देख मगन रहते, 
जुग-जुग जियो हमारे लाल। 

जग में  सहोदर भाईयों की, 
जोड़ियाँ  कई  चर्चित   हुईं। 
नाम कमाया उन्होंने अपना, 
शताब्दियाँ  सुन  हर्षित हुईं। 
कवि - चंद्रकांत पांडेय,
मुंबई / महाराष्ट्र, 

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