बहू-बेटियाँ हवस की शिकार क्यों?
क्या महिला-पुरुष लिंगानुपात ही मुख्य कारण है या घर से बाहर निकलना?
"जब भी कोई बेटी हवस का शिकार होती है, समाज अपराधी को नहीं, पहले उसकी परछाईं का चरित्र प्रमाण-पत्र माँगता है। यही हमारी सबसे बड़ी त्रासदी है।"
देश में जब भी किसी बहू, बेटी या मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना सामने आती है, पूरा समाज कुछ दिनों के लिए जाग जाता है। टीवी चैनलों पर बहसें शुरू हो जाती हैं, सोशल मीडिया पर गुस्से की बाढ़ आ जाती है, नेताओं के बयान आने लगते हैं और फिर वही पुराना सवाल उछाला जाता है—"आखिर गलती किसकी थी?"
हैरानी की बात यह है कि यह प्रश्न अक्सर अपराधी से नहीं, पीड़िता से पूछा जाता है। किसी को उसके कपड़े दिखाई देते हैं, किसी को उसका बाहर निकलना, किसी को उसका मोबाइल, किसी को उसकी नौकरी और किसी को उसकी आधुनिक सोच। ऐसा लगता है जैसे अपराधी ने नहीं, बल्कि पीड़िता ने कोई अपराध कर दिया हो।
हमारे समाज में बेटी के जन्म लेते ही सलाहों का राशन कार्ड बन जाता है...धीरे बोलो...धीरे चलो...सिर झुकाकर रहो...हँसना कम करो...शाम से पहले घर लौट आओ...।
लेकिन बेटे के लिए सलाह बस इतनी-सी—"मेरा बेटा तो ऐसा कर ही नहीं सकता।" यही एक वाक्य कई अपराधों का सबसे मजबूत सुरक्षा कवच बन जाता है।
यदि घर से बाहर निकलना ही अपराध का कारण है, तो फिर उन मासूम बच्चियों का अपराध क्या था, जिनकी दुनिया पालने से शुरू होकर पालने तक ही सीमित थी? यदि कपड़े कारण हैं, तो नवजात शिशु किस फैशन शो में गई थी?
यदि आधुनिकता कारण है, तो अस्सी वर्ष की वृद्धा ने कौन-सी आधुनिकता अपनाई थी? सवाल कठिन हैं, इसलिए समाज आसान उत्तर ढूँढ़ लेता है।
क्या लिंगानुपात जिम्मेदार है?
कुछ लोग कहते हैं कि महिलाओं की संख्या कम हो गई, इसलिए अपराध बढ़ गए। यदि यह तर्क मान लिया जाए, तो क्या हम यह भी मान लें कि इंसान की नैतिकता का आधार केवल जनसंख्या का अनुपात है?
भूख रोटी की हो सकती है, लेकिन हवस केवल शरीर की नहीं होती—वह सत्ता, वर्चस्व और विकृत मानसिकता का प्रदर्शन भी होती है। हवस का गणित जनगणना की तालिकाओं से नहीं चलता।वह वहाँ जन्म लेती है, जहाँ संस्कार मर जाते हैं। अपराधी पैदा नहीं होते, तैयार किए जाते हैं।
जब बेटा बचपन से सुनता है—"लड़के हैं, गलती हो जाती है..."मर्द रोते नहीं..."जो पसंद है, हासिल कर लो..." और दूसरी ओर बेटी से कहा जाता है—"सहन करना सीखो..।"
तब समाज अनजाने में अपराधी और पीड़िता दोनों की भूमिका लिख रहा होता है। कानून भी कभी-कभी तमाशबीन लगता है।
हर घटना के बाद कड़ी कार्रवाई का आश्वासन मिलता है,मोमबत्तियाँ जलती हैं,श्रद्धांजलियाँ दी जाती हैं,मुआवज़े घोषित होते हैं.....फिर कुछ दिन बाद अगली घटना पिछली घटना की जगह ले लेती है। मानो समाज ने संवेदनाओं को भी "ब्रेकिंग न्यूज़" बना दिया हो।
समाधान क्या है?
बेटियों को घर में कैद करना समाधान नहीं है।
समाधान है—बेटों को यह सिखाना कि "ना" का अर्थ "ना" होता है।
समाधान है—स्त्री को सम्मान देना, उसे बराबरी से देखना।
समाधान है—ऐसी न्याय व्यवस्था जो वर्षों नहीं, महीनों में फैसला दे।
समाधान है—ऐसा समाज जहाँ अपराधी को बचाने वाले भी उतने ही शर्मिंदा हों, जितना अपराधी स्वयं।
जब भी अगली बार किसी बेटी के साथ अत्याचार की खबर पढ़ें, उससे पहले यह मत पूछिए कि वह कहाँ थी, क्या पहन रखा था, कितने बजे निकली थी या किसके साथ थी।
पहले यह पूछिए—हमने अपने बेटों को इंसान बनाना कब शुरू किया था?
जिस दिन इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर मिल जाएगा, उस दिन शायद अखबारों के पहले पन्ने पर किसी बहू, बेटी या मासूम की चीख नहीं, उसकी उपलब्धियाँ छपेंगी।
क्योंकि समस्या महिलाओं के कदमों में नहीं, कुछ पुरुषों की सोच में है। और जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक कानून, बहसें और मोमबत्तियाँ केवल रस्में निभाती रहेंगी।
डॉ. सिखा गोस्वामी "निहारिका"
छत्तीसगढ़