अधिकारी होना मजा भी और सजा भी : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा

अधिकारी होना मजा भी और सजा भी : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
मित्रों! अधिकारी कौन नहीं होना चाहता? प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षार्थियों की चाहत होती है कि परीक्षा पास कर वे अधिकारी बनें लेकिन अधिकारी बनना इतना आसान नहीं। अधिकारी बनने हेतु, अनेकानेक परीक्षाएं देनी पड़ती हैं। और यदि कोई अधिकारी बन भी गया तो,उस पर तमाम तरह की जिम्मेदारियां भी आती हैं-एक कहावत भी प्रचलित है कि जो ताज पहनता है,उस पर अनेक परेशानियाँ भी आती हैं,”Uneasy lies the heads,that bears the crown”
कभी कभी अधिकारियों की पोस्टिंग ऐसे स्थानों पर हो जाती है,जहाँ आवागमन के साधन नहीं होते,ऑफिस में सुविधाओं की कमी होती है।कभी दूर दराज़ के इलाकों में तैनाती हो जाती है,जो निर्जन व एकान्त होते हैं,जहाँ परिस्थिति जन्य असुविधाएं होती हैं।सबसे ज़्यादा परेशानी मानवीकृत समस्याओं से अधिकारी आज कल ज़्यादा परेशान होते हैं।उच्च अधिकारी अनावश्यक दबाव बनाते हैं ग़लत काम करने हेतु कभी कभी तो उच्च अधिकारी कहता है कि क्या चाहते हो कि मेरा स्थानान्तरण हो जाय? आज कल बात बात में अधिकारियों के खिलाफ धरना प्रदर्शन भी होता रहता है, जिसमें कई अधिकारियों से तू तू मैमे और हाथापाई की भी नौबत आ जाती है।जाति देखकर पोस्टिंग भी होती है।और तो और उनका मूल्यांकन भी ग़लत होता है।
वर्क प्लेस यदि अच्छा नहीं होता, तो कोई भी अधिकारी अपने बाल बच्चों और परिवार के साथ नहीं रहना चाहते; क्योंकि कई अधिकारियों की हत्याएं भी हो चुकी हैं। कारण यही है कि अधिकारी पास के शहरों में अपने परिवार को रखकर अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं।कभी कभी तो देर की वजह से वे कूदते फ़ानते हाफते दफ़्तर पहुंचते हैं।
साथियों एक जनपद में लगभग सौ सवा सौ दफ़्तर और तीसो विभाग होते हैं,जिसमें अधिकारियों की तैनाती होती है,जिन विभागों में अधिकारी नहीं भी होते,तो भी उस विभाग का चार्ज किसी न किसी अधिकारी के पास होता ही है।अधिकारियों में कोई प्रथम श्रेणी,कोई द्वितीय श्रेणी का अधिकारी होता है।कोई केन्द्रीय सेवा का,तो कोई राज्य सेवा के अधिकारी होते हैं।कुछ प्रमुख विभाग जिसमें राजस्व विकास, चिकित्सा, पुलिस, शिक्षा, उद्योग, परिवहन, विद्युत पी डबल्यू डी,अभियंत्रण,बैंक,महिला एवं बाल विकास,राज मार्ग,नगर विकास,सूचना,समाज कल्याण,आपूर्ति, कृषि,वन, पशु पालन विभाग इत्यादि होते हैं ,जिसमें अधिकारियों की तैनाती होती है।अधिकारी ही अपने विभाग व कार्यालय की उपलब्धियों और अनुप्लब्धियों का जिम्मेदार होता है और अधिकारी के रूप में उसे जिले में बाढ़ ड्यूटी,मेला ड्यूटी, चुनावी ड्यूटी,दंगों के नियंत्रण में ड्यूटी टिड्डियों के अकस्मात आक्रमण की ड्यूटी और अनेकानेक कार्यों में विभागीय कार्यों के साथ साथ लगायी जाती है और उन्हें जिम्मेदार बनाया जाता है। जिले पर मुख्य रूप से जिलाधिकारी जो जिले के अधिकारियों का कण्ट्रोलिंग ऑफिसर होता है और जनपद की कानून व्यवस्था को देखता है;जिसके सहयोग के लिए पुलिस आयुक्त या सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस होता है।और तमाम उच्च अधिकारी होते हैं जो अपना अपना भरपूर सहयोग देते हैं और विकास व व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने में जिलाधिकारी का आदेश पालन करते हैं।जैसे मुख्य विकास अधिकारी विकास हेतु उत्तरदायी होता है।इसी प्रकार से अन्य अधिकारी गण।
हाँ तो बात हो रही थी अधिकारी होना मजा भी और सजा भी।तो आइए देखें कैसे अधिकारी होना मजा और सज़ा दोनों होता है।अधिकारी बनने पर पहले तो ज़िम्मेदारियाँ तो आती हैं कई अन्य परेशानियों से भी रूबरू होना पड़ता है।लेकिन यह भी सच है कि जिस टेबल पर आदमी बैठता है वही काम सिखाता भी है-“Table teaches the work.”
पहले तो अधिकारी बनने से अधिकारिता आती है ऐसे में एक अधिकारी को धीर वीर गंभीर होना चाहिए।वाणी पर नियंत्रण रखना और अनावश्यक वार्ता विवाद से सदैव बचना चाहिए।अधिकारी को कहीं भी चट्टी चौराहों पर नहीं खाना पीना चाहिए।ना ही किसी अनजान के वाहन में बैठना चाहिए ।क्यों नहीं बैठना चाहिए यह आगे इस लेख में स्पष्ट हो जाएगा।आप का चपरासी है यदि कुछ खाने की इच्छा भी हो तो,अपने पास खाद्य सामग्री मगा लेना चाहिए।यदि आप अधिकारी हैं तो-You have to behave like an officer.एक अधिकारी का रूतबा तभी लोगों में भरपूर क़ायम होता है;जब वह ईमानदार मानवी सोच हो और त्वरित कार्यवाही नियमानुसार करने की कोशिश करता है।एक अधिकारी को जो काम नियमानुसार न होने लायक हो उसे नहीं करना चाहिए।अन्यथा ग़लत काम पर ही अधिकारी फँसता है और उसे ब्लैक मेल किया जाता है।मित्रों पर अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज कुछ अधिकारियों ने अपनी जमीरें बेच दी हैं या उसे गिरवी रख देते सिर्फ़ इसलिए की मलाईदार पद से न हटना पड़े और अच्छे जनपद और कमाईदार विभाग से रुख़्सत न होना पड़े।मित्रों जिस दिन अधिकारी इन सब चीजों की परवाह किए बिना अपनी सेवाएं देना शुरू कर देंगे,सच मानिए कायाकल्प अवश्वसंभावी होगा;लेकिन यह आज के नैतिक पतन के माहौल में असंभव नहीं तो कठिन अवश्य दिखता है।
शासकीय व्यवस्था में एक अधिकारी जो प्रथम श्रेणी का है या द्वितीय श्रेणी का उसे प्रतिदिन उपस्थिति पंजिका में दस्तख़त नहीं करने पड़ते;केवल वह उसका अवलोकन करता है;लेकिन उसे अपने मुख्यालय पर हमेशा उपलब्ध रहना होता है।यदि मुख्यालय छोड़ता है तो उसे सक्षम अधिकारी या जिलाधिकारी से अनुमति लेकर ही बाहर जाना पड़ता है।
एक अधिकारी प्रायः रात में मुख्यालय छोड़ कर समीप के जिले में चले जाया करते थे,एक दिन उनकी कार एक ट्रक से जा भिड़ी और उनको गंभीर चोटें आई तो सवाल उठा कि आप किसकी अनुमति से अपना मुख्यालय छोड़कर गए थे।उनका चिकित्सा प्रतिपूर्ति काफ़ी दिनों तक अटका रहा।
एक बार एक अधिकारी अपने गाँव शासकीय वाहन से गए और रात में उनके पड़ोसियों द्वारा उनका वाहन ग़ायब कर दिया गया वे भी उस मामले में बुरी तरीके फस गए और उनके वेतन से वाहन का पूरा मूल्य वसूला गया और उनकी पदोन्नति भी बाधित हुई।एक बार एक अधिकारी की ड्यूटी चुनाव में लगी थी नासमझी में उन्होंने एक उम्मीदवार को अपने वाहन पर बैठा लिया तो उस उम्मीदवार का विरोधी अधिकारी महोदय की शिकायत जिलाधिकारी से किया कि वह एक खास अभ्यर्थी का प्रचार कर रहे थे उनको जिलाधिकारी ने तत्काल प्रभाव से दण्ड देकर हटा दिया।
अधिकारीयों द्वारा अपने वाहनों का दुरपयोग तो किया ही जाता है,एक बार एक अधिकारी महोदय अपने व्यक्तिगत कार्य से किसी महानगर को जा रहे थे तो उनके वाहन से एक व्यक्ति का एक्सीडेंट हो गया और वह उस मामले में बुरी तरह से फस गए।और वर्षों मुकदमा लड़ना पड़ा।
एक बार एक अधिकारी महोदय अपने सरकारी वाहन से वाराणसी आए जब वह लंका से होकर गुज़र रहे थे और छात्रों के आंदोलन में फ़स गए और छात्रों ने उनके वाहन को क्षति ग्रस्त कर दिया और उसे फूलने ही जा रहे थे कि उनके मुख से निकल गया भैया मैं भी इसी विश्वविद्यालय का छात्र रहा हूँ,तब जाकर छात्रों ने उनके वाहन को छोड़ा।
जिले के एक प्रथम श्रेणी के अधिकारी की ड्यूटी एक छात्र आंदोलन को रोकने में लगायी गयी थी;उनके साथ पुलिस के सर्किल ऑफिसर भी थे परन्तु छात्रों ने अधिकारी महोदय के वाहन को आग के हवाले कर दिया।
फिर भी अधिकारी अपने शासकीय वाहनों के दुरपयोग से बाज़ नहीं आते और आए दिन किसी न किसी समस्या में फसते जाते हैं और कभी कभी तो उन्हें निलम्बन भी झेलना पड़ता है और कभी उनके वेतन से वसूली और वेतन वृद्धि भी रुक जाती है।उनका पूरा करियर बर्बाद हो जाता है।मित्रों कुछ अराजक तत्व ऐसे भी होते हैं जो सूचना अधिकार अधिनियम के तहत सूचनाएं माँगते हैं और जब अधिकारी सूचना समय से नहीं दे पाते तो संबंधित राज्य के सूचना आयुक्त उनके वेतन से 25000/-रुपए काटने का आदेश सम्बन्धित अधिकारी के जिले के जिलाधिकारी को भेज देता है,जिससे सूचना माँगने वाले हर्षातिरेक में मदमस्त होकर उस अधिकारी की लानत मलामत करते दिख जाते हैं।
मित्रों अभी हम अधिकारियों की कुछ परेशानियों का जिक्र कर रहे थे अब आइये उनके रुतबे को भी देखते हैं एक अधिकारी का महत्व उसके ड्राइवर वाहन,चपरासी नौकर चाकर और उसके सरकारी क्वार्टर और उसके साथ चलने वाले गार्ड से ही होती है।जब एक अधिकारी अपने कार्यालय शासकीय वाहन से जाता है तो उसकी शानों शौकत देखते ही बनती है;जब उसका वाहन रुकता है,झट से चपरासी वाहन का दरवाजा खोलता है,गार्ड मोर्चा संभालता है,साहब की फ़ाइलें जरूरी कागजात लेकर उनके पीछे पीछे चलता है तो मानो एक राजशाही ठाट ही नज़र आती है।और अधिकारी यह सोचकर फूले नहीं समाते।भाई अधिकारी तो अधिकारी ही होता है वह क्यों न अधिकारिता जताये और अपने पद पर क्यों न गर्व और गर्वानुभूति करे।
 पाठकों मैं आप सभी को बताना चाहता हूँ कि किसी भी व्यक्ति का चाल चरित्र और व्यवहार छिपा नहीं रहता वह वातावरण में गंध की भाँति फ़ैल जाता है और पब्लिक बहुत बड़ी जज होती है,जो पहचान कर लेती है अधिकारियों का।
पब्लिक अच्छे अधिकारियों को रोकने हेतु आंदोलन भी करती है और बुरे के खिलाफ़ आवाज़ भी उठाती है।यहाँ मैं एक अंग्रेज़ी के विद्वान के कथन को उद्धृत करना चाहूँगा कि-You can befool all the people some time and you can befool some people all the time but you can not befool all the people all time.
कभी कभी अच्छे अधिकारी सही काम करने में कठिनाई महसूस करते हैं वे तनाव ग्रस्त रहने लगते हैं जब उन्हें ईमानदारी से काम नहीं करने दिया जाता।इसी कारण बहुतेरे अधिकारी कुसमय में कई रोगों के शिकार हो जाते हैं।
साथियों अंत में मैं आप सभी को बताना चाहूँगा कि हम सभी को अपना अंतःकरण पवित्र रखकर कार्य करना चाहिए क्योंकि-Mother nature never spare anyone; it gives balancing effect to all deeds to all concern.

लेखक: कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित कई पुस्तकों का प्रणयनकर्ता,वार्ताकार,साहित्यकार एवं शिक्षाविद हैं,और पूर्व में प्रथम श्रेणी का अधिकारी रह चुका है।

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