स्वामी विवेकानन्द:युवाओं के पथ प्रदर्शक और प्रेरणास्रोत;उनकी जयंती पर विशेष चिंतनपूर्ण लेख : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
मानवतावादी महान दार्शनिक,महान विचारक,प्रेरक व्यक्तित्व के धनी स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म १२ जनवरी,१८६३ को कलकत्ता अब(कोलकता)में हुआ था।उनके बचपन का नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था।उनके पिता विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी था।स्नातक की पढ़ाई के दौरान उनका सम्पर्क रामकृष्ण परमहंस से हुआ;जो माँ काली के पुजारी थे।जनश्रुति है कि उन्होंने विवेकानन्द को भी माँ काली से बात कराई थी,और उनका जीवन पूरी तरह बदल गया।विवेकानन्द ने उन्हें अपना गुरु मान लिया।लगभग पाँच वर्षों तक उन्होंने देश विदेश भ्रमण किया।वे वेदान्त दर्शन के प्रमुख अनुयायी थे।
उनका प्रेरक वाक्य था कि-“उठो,जागो और तब तक न रुको जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो जाये।”
वे कहते थे कि जो सत्य है उसे साहस पूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो;उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं,इस ओर मत ध्यान दो।तुम अंतस्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ।सभी जीवंत ईश्वर है,इस भाव से सबको देखो।
No knowledge comes from out side it is all inside.
मानव देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है एवं मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ प्राणी है,जो मनुष्य मुक्ति प्राप्त करना चाहता है उसे एक जन्म में हजारों वर्षों का काम करना पड़ेगा।यथार्थ आत्मोन्नति के सन्दर्भ में उनका मानना था कि मन का विकास करो,उसका संयम करो;उसके बाद जहाँ इच्छा हो,वहाँ इसका प्रयोग करो-उससे अति शीघ्र फलप्राप्ति होगी।वे कहते थे कि-
As you have come in this world leave some mark behind otherwise there will be no difference between you tree and stone.
उनका विचार था कि हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है,उतना ही हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है।मानव सेवा के सन्दर्भ में कहते थे कि यह लाखों जप ध्यान से बढ़कर है।वे निःस्वार्थ सेवा को सच्ची सत्ता का आधार मानते थे।अपने से निम्न श्रेणी वालों के प्रति हमारा एक मात्र कर्तव्य है-उनको शिक्षा देना,उनके खोये हुए व्यक्तित्व के विकास के लिये सहायता करना।शिक्षा को परिभाषित करते हुए वे कहते थे कि”शिक्षा मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।” वे वर्तमान शिक्षा को निषेधात्मक शिक्षा की संज्ञा देते थे।उनकी यह भी सोच थी-कि “Football is more necessary than Geeta.” उनका कहना था कि एक मात्र ब्रह्मचर्य का ठीक तरह से पालन कर सकने पर सभी विद्याएँ बहुत कम समय में हस्तगत हो जाती हैं।वे क्रांतिकारी उद्बोधन देते हुये कहते थे कि
सभी मरेंगे-साधु या असाधु,धनी या दरिद्र-सभी मरेंगे।चिरकाल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा।अतएव उठो,जागो और सम्पूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ।भारत में घोर कपट समा गया है।हमे चरित्रवान होना होगा।जड़ की कोई शक्ति नहीं;सब आत्मा की शक्ति है।आत्मा अजर,अमर है उसे न कोई जला सकता है न काट सकता है।किसी के साथ विवाद न करो,हिलमिलकर अग्रसर होवो।सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करो।लोग स्तुति करें या निंदा।लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हों तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग में,तुम न्याय से कभी भ्रष्ट न हो।वीरता से आगे बढ़ो।एक दिन या एक साल में सिद्धि की आशा न रखो।उच्चतम आदर्श पर दृढ़ रहो।स्थिर रहो।स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो।आज्ञा पालन,ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्य रूप में परिणत करने हेतु सदा प्रस्तुत रहना-इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हें अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता।सत्य,मानव जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा अटल रहो।तुम संसार को हिला कर रख दोगे।याद रखो व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है।इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं।बड़े आदमी वे हैं;जो अपने हृदय रुधिर से दूसरों का रास्ता तैयार करते हैं।
उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि भावों के घर में चोरी न हो पाये।सब विषयों में व्यावहारिक बनना होगा।मन और मुंह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा।गुरु की शिक्षा को आत्मसात करते हुए वे कहते थे कि लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर,एकाग्र मन से,अपना कार्य करना होगा।हैरान होने से काम नहीं चलेगा।धैर्य धारण करने पर सफलता अवश्यसंभावी है।
सावधान रहना,दूसरों के अत्यंत छोटे अधिकार में भी हस्तक्षेप न करना।स्वामी जी,शुद्ध चरित्र होने पर बल देते थे।हमे नीतिपरायण तथा साहसी बनना होगा,अंतःकरण पूर्णतया शुद्ध रखना होगा।वे प्राणों के लिए कभी न डरने की बात कहते थे।वे समझाते थे कि वीर पुरुष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते,मन में पाप का कभी विचार नहीं लाते।प्राणी मात्र से प्रेम करते हैं।
कायरता,पाप,असदाचरण तथा दुर्बलता तुममें नहीं रहनी चाहिए; तभी आवश्यकीय बस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी।वे यह भी कहा करते थे कि पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो।सारा धर्म इसी में है।धर्म का रहस्य आचरण से जाना जाता है।कायर मत बनो।साहसी बनो।बिना विघ्न बाधाओं के कोई महान कार्य नहीं हो सकता।प्रत्येक काम को करने में तीन तरह की अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है,उपहास,विरोध और स्वीकृति।
श्रेयांसी बहुविघ्नानी(अच्छे कर्मों में कितने ही विघ्न आते हैं।)समय,धैर्य तथा अदम्य इच्छा शक्ति से ही कार्य हुआ करते हैं।वे कहा करते थे कि जब तक जीना तब तक सीखना-अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।पवित्रता,दृढ़ता तथा उद्यम ये तीन गुण मैं एक साथ चाहता हूँ।
purity,perseverance and energy these three I want
भाग्य बहादुर और कर्मठ व्यक्ति का ही साथ देता है-पीछे मुड़कर मत देखो।आगे अपार शक्ति,अपरिमित उत्साह,अमित साहस और निस्सीम धैर्य की आवश्यकता है-और तभी महान कार्य निष्पन्न किए जा सकते हैं।हमें पूरे विश्व को उद्दीप्त करना है।वे कहते थे कि पवित्रता,धैर्य तथा प्रयत्न के द्वारा सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं।पवित्रता और शक्ति के साथ अपने आदर्श पर डटे रहो।यदि आप का आदर्श जड़ है;तो आप भी जड़ हो जाओगे।
ईर्ष्या और अहंकार को दूर कर दो।संगठित होकर दूसरों के लिए कार्य करना सीखो।पूर्णतः निःस्वार्थ रहो और काम करो।सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो,क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होती है और इससे हर चीज बर्बाद हो जाती है।यदि तुम्हें किसी के कार्य में गलती नज़र आये तो तुम नम्रतापूर्वक गलती के प्रति उन्हें सजग कर दो।एक दूसरे की आलोचना ही;सब दोषों की जड़ है।किसी भी संगठन को विनष्ट करने में इसका बहुत बड़ा हाथ है।
वे गुरु,ईश्वर और हृदय में उत्साह की वकालत करते थे और कहते थे कि हमे नाम,यश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करना चाहिए।
उनका विचार था कि प्रत्येक मानव व राष्ट्र को बड़ा बनाने के लिये तीन बातें आवश्यक हैं ।१-सौजन्य की शक्ति में दृढ़ विश्वास २-ईर्ष्या और संदेह का अभाव ३-जो सन्मार्ग पर चलने और सत्कर्म करने में संलग्न हो,उनकी सहायता करना।
स्वामी जी भारत को धर्म और दर्शन की पुण्य भूमि मानते थे।हिन्दू समाज में व्याप्त जातिवाद,धार्मिक पाखंडवाद,पुरोहितवाद,आडम्बर और रूढ़ियों के सख़्त खिलाफ थे।वे देश के मृत्यु का चिह्न अपवित्रता और चरित्रहीनता को मानते थे और कहते थे कि यदि यह किसी जाति में प्रवेश कर गई तो समझना उसका विनाश निकट है।
अन्त में वे कहते थे कि किसी बात की आवश्यकता नहीं,आवश्यकता है तो केवल प्रेम की,अकपटता एवम् धैर्य की।
इसीलिए रविन्द्र नाथ ठाकुर ने एक बार कहा था कि “यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये।उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएँगे,नकारात्मक कुछ भी नहीं।”
रोमा रोला एक फ़्रांसीसी विचारक जिन्हें १९१५ में नोबेल पुरस्कार मिला था ने उनके बारे में कहा था कि-उनके द्वितीय होने की कल्पना करना ही असंभव है,वे जहाँ भी गए,सर्वप्रथम ही रहे।सभी पर प्रभुत्व पा लेना ही उनकी विशिष्टता थी।
लेखक:शिक्षाविद,मोटिवेशनल स्पीकर,कई सम्मानों से विभूषित प्रथम श्रेणी पूर्व अधिकारी है।
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