मंत्र, मंत्रों के प्रकार, मंत्रों को सिद्ध करने के नियम और मंत्रों से आध्यात्मिक लाभ : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
मंत्रों में अद्भुत शक्ति होती है,इससे सूक्ष्म तरंगें निकलती हैं;जिससे शक्ति दिव्य ऊर्जा के रूप में साधक को प्राप्त होती है।अवचेतन मन की सुषुप्त शक्तियों को जागृत करने में मदद मिलती है।
कहते हैं “मननात त्रायते इति मंत्रः”यानि मन को जो त्राण दे,उसे मंत्र कहते हैं।मंत्र शब्दों और ध्वनियों का ऐसा समंजन है;जिससे ऊर्जा निःसृत होती है।यह अक्षर,अक्षरों,शब्दों का ऐसा समुच्चय या वाक्यांश होता है;जिसका उपयोग,मन को केंद्रित करने,शांति प्राप्त करने,आध्यात्मिक और धार्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है।मंत्रों का प्रयोग/उपयोग ध्यान,प्रार्थना और ऊर्जावान उपचार जैसी प्रथाओं में किया जाता है।मंत्र;मन,शरीर और आत्मा को सामंजस्य में लाने में सहायक होता है।
मंत्रों के सन्दर्भ में यह भी हमारे शास्त्रों में वर्णित है कि-
“मन्त्राणाम मातृका शक्ति शब्दानाम ज्ञान रूपिणीम”जिसका अर्थ होता है कि इस संसार में जो भी मंत्र है,शब्द है उसमें जो मातृका शक्ति है,अक्षर शक्ति है और उन अक्षरों और शब्दों से जो अर्थ और ज्ञान बोध होता है वह सब महामाया जगदम्बा का ही वैभव कहा जाता है। मंत्रों की संख्या करोड़ों में बताई गई है, परन्तु वेदों के अनुसार मंत्रों की संख्या २०४१६ है, ऋगवेद में १०५८९, यजुर्वेद में १९७५, सामवेद में १८७५, और अथर्ववेद में कुल ५९७७ मंत्रों का उल्लेख मिलता है।मंत्र आधा अक्षर का भी होता है जैसे-मं यह ।एक अक्षर का मंत्र ॐ।तीन अक्षरी मंत्र ॐ त्रिम,पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय,सप्ताक्षरी मंत्र ॐ नमो नारायण,९ अक्षरी जिसे नवार्ण मंत्र भी कहते हैं-ॐ ऐ ह्रीं चामुण्डाये विच्चे,इसी प्रकार १२ अक्षरी,२४ अक्षरी जैसे गायत्री मंत्र,३६ अक्षरी,५६ अक्षरी,१०० अक्षरी जिसे सताक्षरी मंत्र भी कहते है,इत्यादि।जिन मंत्रों के जाप से जिह्वा होंठ और साधक स्वम हिलता हो;उसे उपांशु कहते हैं जैसे-हरि ओम हरि ओम्।यदि किसी मंत्र को मन ही मन जाप किया जाता है तो उसे मानसी जाप कहते हैं।मन ही मन जाप को अजपा भी कहा जाता है।
मंत्रों के मुख्यतःतीन प्रकार बताए गए हैं।पहला वैदिक मंत्र;इनकी साधना करने हेतु कड़ी मेहनत व ध्यान की आवश्यकता होती है।इन मंत्रों का प्रभाव स्थायी होता है,इसमें स्वच्छता और पवित्रता का पूरा ध्यान रखना होता है।दूसरा तांत्रिक ये वैदिक मंत्रों की अपेक्षा जल्दी सिद्ध होते हैं,परन्तु प्रभाव जल्दी समाप्त हो जाता है ।और तीसरा शाबर मंत्र,ये दोनों से भिन्न अत्यंत सरल होते हैं और बहुत जल्दी सिद्ध होते हैं,इनका भी प्रभाव बहुत कम समय के लिए होता है।अब आइये कुछ और प्रकार,मंत्रों के देंखे कुछ मनीषियों ने छः प्रकार के मंत्रों का जिक्र किया है।
१-शांति मंत्र,इस मंत्र का जाप शांति प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है।जैसे शत्रुओं से बचाव,कष्ट को दूर करने में आदि।जैसे नमः शिवय,हनुमते नमः आदि।
२-उच्चाटन मंत्र;इस मंत्र का उपयोग विकारों को दूर करने हेतु किया जाता है जैसे किसी व्यक्ति में नशे के विकार को दूर करना,किसी को कहीं से दूर कर देना आदि के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
३-आकर्षण मंत्र;इस मंत्र का प्रयोग किसी चीज को आकर्षित करने हेतु किया जाता हैं जैसे धन,वैभव,यश ,मान ,प्रतिष्ठा आदि।
४-सात्विक मंत्र;इस मंत्र का उपयोग मन शरीर में सात्विकता का प्रभाव बढ़ाने हेतु किया जाता है।
५-स्तंभन मंत्र;इसका मतलब ही होता है समाप्ति।किसी रोग बीमारी को दूर भगाने के लिए,कोई लगातार परेशान कर रहा है उसे रोकने में भी इसका उपयोग किया जाता है।
६-मारण मंत्र;जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि मारने हेतु इसका प्रयोग करते हैं।शत्रुओं को मारने या दुष्ट राजाओं के विनाश हेतु भी इसका प्रयोग,प्राचीन समय में होता था।
वैदिक पाठ,धार्मिक आयोजनों,अनुष्ठानों या अन्य कार्यों के दौरान कार्य की पवित्रता के लिए और देवी देवताओं के आशीर्वाद और मन की शांति प्राप्त करने के उद्देश्य से मंत्रों का जाप किया जाता है।कहते भी हैं कि मन की शांति से बढ़कर इस दुनियाँ में कोई भी सम्पत्ति नहीं है।
“मनस:शांतित:महत्तरम् धनम लोके नास्ति।” अब आइये जाप के लिए और मंत्रों की सिद्धि के नियम विधान पर ध्यान दें।
सुधी पाठकों;मंत्रों की सिद्धि के लिए कुछ नियमों और आदतों का पालन करना आवश्यक होता है-जैसे साफ़ सफ़ाई,आसन, पवित्रता,नियमितता,एकाग्रता,शुद्ध सात्विक आहार,श्रद्धा और विश्वास,गोपनीयता,गुरु का मार्गदर्शन आदि।गुरु दीक्षा लेकर जो मंत्र जाप किए जाते हैं वह जल्द सिद्ध होते हैं।एक निश्चित समय पर और निश्चित संख्या में प्रतिदिन जो मंत्र जपे जाते हैं वह भी सिद्ध होते हैं।कहा जाता है कि यदि किसी मंत्र का सवा लाख जाप कर लिया जाय तो वह सिद्ध हो जाता है।मन और शरीर की पवित्रता और शुद्धता के साथ जो मंत्र जपा जाता है,उसे भी जल्दी सिद्ध मिलती है।मंत्रों के जाप के दौरान सात्विक आहार लिए जाने का विधान होता है।सही समय विधि और दिशा को ध्यान में भी रखकर मंत्रों के जाप से सिद्धि मिलती है।एकाग्रता और विश्वास के साथ मंत्रों के जाप करने चाहिए।मंत्रों का सही उच्चारण करना चाहिए अन्यथा लाभ की जगह हानि होती है।
जैसे-जय त्वम् देवि चामुण्डे,जय भूतार्तहारिणी(सभी प्राणियों की पीड़ा हरने वाली)यदि कोई साधक भूतार्तहारिणी के स्थान पर भूतार्तकारिणी का उच्चारण करे तो इसका मतलब सभी प्राणियों को पीड़ित करने वाली हो जाएगा।
आइये एक सरल उदाहरण से समझिए जैसे-कोई उच्चारण करे भार्याम रक्षति भैरवी-यानि पत्नी की रक्षा यदि इसका ग़लत उच्चारण कोई भार्याम भक्षति भैरवी कहे तो,पत्नी का नाश होगा।
इसी लिए कहते हैं कि मंत्रों के जाप के समय मंत्रों का उच्चारण ठीक से किया जाना चाहिए;अन्यथा प्रभाव के स्थान पर दुष्प्रभाव देखने को मिलता है।कई साधक ग़लत प्रयोग से पागल तक हो जाते हैं।विकलांगता भी आ जाती है।
मंत्रों के लाभ क्या क्या होते हैं आइये इस पर अनुशीलन किया जाए।साधकों,मंत्रों के जाप से बहुत लाभ होता है जैसे-मन को एकाग्र करने में,मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है।आन्तरिक शांति और सामंजस्य को बढ़ावा मिलता है।उच्च चेतना और दिव्य ऊर्जाओं से जुड़ने का अवसर प्राप्त होता है।शरीर और मन का शुद्धिकरण होने लगता है।आत्म विश्वास में बढ़ोत्तरी और इच्छाओं की पूर्ति होती है।समस्याओं की समाप्ति और सफलता का सुअवसर प्राप्त होने शुरू होते हैं।भय,कष्ट,दोषों की समाप्ति होने लगती है।पाप विनष्ट होते हैं और शांति प्राप्त होने लगती है।
मंत्र साधना का समय मास व दिन के सन्दर्भ में हमारे मनीषियों ने उद्धृत किया है कि शुक्ल पक्ष,की द्वितीया तिथि,पंचमी,सप्तमी,अष्टमी,दशमी, त्रयोदशी,पूर्णिमा,कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि।कार्तिक मास,अश्वनी मास,वैशाख का मास।अक्षय त्रितीया,नवरात्र का समय,नवसंवस्तर,दिवाली, होली,शिवरात्रि,ग्रहण का काल मंत्र जाप एवं साधना हेतु उपयुक्त होता है।आत्मीय साधकों
मंत्रों के आगे पीछे कुछ महत्वपूर्ण शब्द लगे होते हैं;आइये उनकी व्याख्या की जाय।
ॐ-ओंकार बिन्दु संयुक्तम,नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदम,मोक्षदम,चैव ओंकाराय नमो नमः।। ॐ तीन शब्द से निर्मित अ +ऊ +म् ।अ मूलाधार से निकलते हुए नाभि से स्पर्श करते हुए कंठ तक आता है और म् बोलते ही मुंह बंद हो जाता है।वैज्ञानिकों ने इसे ५२८ हर्ट्ज़ पर इसे रिकॉर्ड किया है।इसे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति,संरक्षण और विनाश का प्रतीक माना गया है;जिसे परिवर्तन का चमत्कारी स्वर भी घोषित किया गया है।इससे मन शरीर की सुषुप्त शक्तियों और चक्रों के जागरण तथा तनाव को कम करने में भी मदद मिलती है।
नमः-इसका मतलब नमस्कार करना,किसी का वंदन करना है।
स्वाहा-इसका अर्थ रिस्पेक्ट करना,प्रशंसा करना,शरण में जाना।
स्वधा-यह सिर्फ पितर गणों के लिए प्रयोग किया जाता है।जब हम कुछ पितरों को अर्पण करते हैं तो इसका प्रयोग करते हैं।
वषट-नियंत्रण में रखने और वश में करने या होने हेतु इसका प्रयोग।
हुम-इसका उच्चारण साधक अपनी रक्षा हेतु करता है।इस शब्द से जाप करने वाले के आस पास एक तरह का कवच बन जाता है
वोषट्-इस शब्द का भी अर्थ वश में करना,सिद्धि प्राप्त करने की लालसा में अदृश्य शक्ति से माँग करना कि मुझे अमुक की प्राप्ति हो जाए।
फट-फट शब्द सीधे उस शक्ति की ओर जाता है,वाण की तरफ़।
हुम फट-साधक इस शब्द से अपनी रक्षा करने हेतु आराध्य से कहता है।जैसे-ॐ हम हनुमते नमः रुद्रात्मकाय हुम फट।
गेय,हन,मारय मारय,विदीर्णाय,विनाशाय-यह शब्द किसी के नुकसान के लिए,प्राणघातक होता है।इसका नुकसान जाप करने वाले को भी भुगतना पड़ता है।अतः किसी के मृत्यु के लिए मंत्र जाप प्रयोग नहीं करना चाहिए।
ॐ फट स्वाहा-यह शब्द ,ब्रह्माण्ड में साधक अपनी सभी इन्द्रियाँ ऊर्जा व सार के साथ अपने को स्तुत्य देव देवी के समक्ष पूरी तरह से समर्पित करता है।
ऐम-यह शब्द विद्या ज्ञान और वाक्सिद्धि की देवी सरस्वती का बीज मंत्र है,जिसे वाग् बीज भी कहा जाता है।इससे ज्ञान,बुद्धि ,कला, वाकसिद्धि को बढ़ाने के लिए किया जाता है।
श्रीम-सुख,समृद्धि,धन,वैभव प्राप्त करने के निमित्त और लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त करने हेतु।
ह्लीम-यह शब्द साधक के भावनात्मक शक्ति को बढ़ाता है जाप में जितना ही भावनात्मक शक्ति बढ़ेगी सिद्धि उतनी जल्दी प्राप्त होगी ।
क्लीम-सभी चीजों को आकर्षित करने का बीज मंत्र है।काम प्रेम आकर्षण और सम्बन्धों में सफलता के लिए इसे जपा जाता है।यह शब्द शक्तिवान और आकर्षणकारी ऊर्जा उत्पन्न करता है।
कामदेव,कृष्ण और काली माँ का भी यह प्रतिनिधित्व करता है।
कोई भी मंत्र कोई चुरा नहीं सकता यदि वह गुरु द्वारा दिया गया हो।या स्वप्न में कोई देवी देवता आकर दिए हो।या आप उस मंत्र के अंत में ॐ लगा दें।जैसे ॐ नमः शिवय ॐ।
लेखक: शिक्षाविद,कई राज्य स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित,ऑल इंडिया रेडियो का नियमित वार्ताकार,मोटिवेशनल स्पीकर तथा प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है।
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संपादकीय/ मंत्र/ नियम