मानव शरीर में, ऊर्जा के मुख्य सात रहस्य मय, लौकिक व पारलौकिक केन्द्र : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
मानव शरीर की संरचना बहुत ही जटिल है।हमारे शरीर में ऊर्जा के कई केन्द्र होते हैं,जिसे हम चक्र के नाम से जानते हैं। चक्र गहराई से अंतःश्रावी तन्त्र और तंत्रिका तंत्र से सम्बद्ध होते हैं; जो भौतिक शरीर के साथ बातचीत करते हैं।हमारा शरीर इन्हीं ऊर्जा केन्द्रों से संचालित होता है।चक्रों का विचार योग दर्शन से अस्तित्व में आया।योग और तन्त्र शास्त्र के अनुसार चक्र गोलाकार पहिए के आकार के सूक्ष्म ऊर्जा केन्द्र होते हैं; जो शारीरिक,मानसिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। मुनि महात्मा एवं योगी जन इन केन्द्रों को जागृत कर अपार शक्ति को प्राप्त करने में समर्थ हो जाते हैं और वे ब्रह्मांडीय ऊर्जा(चेतना)से भी सीधे अपने को जोड़ सकने में समर्थवान हो जाते हैं;जिन्हें अध्यात्म की भाषा में परमहंस कहा जाता है।यदि ये चक्र मानव जीवन में अवरुद्ध हो जाते हैं तो कई प्रकार की शारीरिक व मानसिक समस्याएं उत्पन्न हो करते हैं।इन चक्रों के संतुलन से जीवन शक्ति सुचारू रूप से प्रवाहित होती है।
वैसे तो शरीर में कुल ११४ चक्र होते हैं ,जिनमें से सात अति महत्वपूर्ण होते हैं। जिसे मूलाधार,स्वाधिष्ठान,मणिपुर, अनाहत,विशुद्धि,आज्ञा चक्र और सहस्त्रार के नाम से जाना जाता है।कुछ मनीषियों ने चक्रों की कुल संख्या २२५ बताई है।और उनमें से १२ को अति महत्वपूर्ण बताया है जिसे क्रमशः रूट चक्र,सैक्रल चक्र,सोलर प्लेक्सेस चक्र,हर्ट चक्र,थ्रोट चक्र,थर्ड आई चक्र,क्राउन चक्र,सोल स्टार चक्र,स्पिरिट स्टार चक्र,यूनिवर्सल चक्र,गैलेक्टिक चक्र(गांगेय)और डिवाइन गेटवे चक्र के नाम से पुकारते हैं।
चक्र ऊर्जा के संवाहक होते हैं।चक्र रीढ़ की हड्डी के आधार से लेकर सिर के शीर्ष तक स्थित होते हैं।इन चक्रों में हमारे जन्म जन्मांतर के कर्म,वासनाएँ,संस्कार,हमारे पुण्य और पाप आते हैं।इनकी असक्रियता के कारण भी हमे कई प्रकार की शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक समस्याएं देखने को मिलती हैं और यदि इन चक्रों को जागृत कर लिया जाए तो हमे अपार शक्ति और सफलता मिल सकती है।चक्रों की शक्ति से आप बलवान से बलवान व्यक्ति को हरा सकते हैं।इन चक्रों की शक्ति को जागृत कर कोई भी व्यक्ति,अपने शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य में सुधार, स्पष्टता,एकाग्रता,ऊर्जा स्तर में वृद्धि,उच्च चेतना और आध्यात्मिक विकास कर सकता है।साधु,महात्मा इसे जागृत कर परम पद को भी प्राप्त करते हैं।
मूलाधार चक्र-इसे रूट चक्र भी कहते हैं।यह आधार चक्र मेरुदण्ड की अन्तिम पूँछ की हड्डी के आधार पर स्थित होता है।इसे शरीर के ऊर्जा का इंजन भी कहते हैं।यह पृथ्वी तत्व से जुड़ा होता है।मनीषियों का कहना है कि पृथ्वी तत्व जिसका,जितना मजबूत होता है वह जिस भी काम में हाथ डालता है;वह पूरा होता है।शरीर के ऊर्जा का आधार भी यही होता है;जिसे कुंडलिनी शक्ति या दिव्य ऊर्जा के नाम से जानते हैं।कुण्डलिनी शक्ति के जागरण के समय मूलाधार ही इसकी पावनता और सतीत्व की रक्षा करता है।इसका रंग लाल होता है और यह ४ दल के कमल के समान होता है।इसका बीज मंत्र “लं “होता है।इसको जागृत करने के निम्न मंत्र भी उपयोग में लाते हैं।”ॐ लं परम् तत्वाय गं ॐ फट”या “ॐ ह्रीं लं लं लं ह्रीं स्वाहा”अथवा “ॐ ह्रीं लं कुण्डलेश्वरी लं नमः”मंत्र का प्रयोग होता है।यह चक्र सुरक्षा,स्थिरता,अस्तित्व के लिए जिम्मेदार होता है।जो आर्थराइटिस/जॉइंट पेन या थके थके से रहते हैं उन्हें मूलाधार को जागृत करना चाहिए।
स्वाधिष्ठान चक्र-यह चक्र मूलाधार से २ इंच ऊपर अवस्थित होता है।इसे त्रिक चक्र भी कहते हैं।यह ६ दल वाले कमल के समान होता है।इसका रंग नारंगी(ब्राइट ओरेंज)होता है।यह जल तत्व से जुड़ा होता है।यह रचनात्मकता,यौन ऊर्जा एवं भावनाओं को नियंत्रित करता है।काम वासना,उत्तेजना,आवेग,सम्वेग सेक्स ऑर्गन,ब्लैडर को ठीक रखता है;यदि इसमें विकार हो जाए तो नपुंसकता,सेक्स डिसऑर्डर,मूत्र सम्बन्धी रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।इसको जागृत करने का बीज मंत्र “वं”है।एक और मंत्र से इसका जागरण करते हैं वह है”ॐ वं वं स्वाधिष्ठान ज्रागय जाग्रय वं वं ॐ फट”।
मणिपुर चक्र-इस चक्र का दूसरा नाम सौर्य जाल चक्र भी है।यह नाभि के पास स्थित होता है।इसीलिए इसे नेवल चक्र भी पुकारा जाता है।इसका रंग पीला होता है।यह १० दल युक्त कमल के समान होता है।जिसका बीज मंत्र “रं”होता है।यह चक्र अग्नि तत्व से जुड़ा होता है।व्यक्तिगत शक्ति,इच्छा शक्ति,आत्म विश्वास और पाचन शक्ति को ऊर्जा देने में इसका योगदान होता है।यदि यह कमजोर हो जाए तो आत्म विश्वास की कमी और पाचन व लीवर सम्बन्धी समस्याएं,घाव,सूजन उत्पन्न हो जाती हैं।
इसको जागृत करने का मंत्र”ॐ रं जाग्रनाय ह्रीं मणिपुर रं ॐ फट”भी है।
अनाहत चक्र-इसे हृदय चक्र भी पुकारा जाता है।यह हरे रंग जैसा १२ दल के कमल के समान होता है।यह वायु तत्व से जुड़ा होता है।यह प्रेम,दया,करुणा,क्षमा और सहानुभूति का केन्द्र होता है।इसकी असक्रियता से व्यक्ति ईर्ष्यालु,क्रोधी और निर्दयी हो जाता है;और हृदय सम्बन्धी अनेक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।इसका बीज मंत्र “यं” है।इसको जागृत करने का एक और मंत्र है जो”ॐ यं अनाहत जाग्रय जाग्रय श्री ॐ फट”।
विशुद्धि चक्र-इसे थ्रोट चक्र भी कहते हैं।यह परमार्थ और भौतिक जगत के बीच का केन्द्र माना जाता है;और सभी सूचनायें इसी चक्र में होती है।यह संचार,आत्माभिव्यक्ति,वाक् शक्ति और सत्य के लिए ज़िम्मेदार होता है।यह थॉयरायड ग्लैण्ड,गला,भोजन नली,स्वांस और वाणी में आकर्षण को ठीक रखता है।इसका रंग नीला होता है।यह १६ दल वाला कमल के समान होता है।यह आकाश तत्व से जुड़ा होता है।इसका बीज मंत्र “हं”है।इसको जागृत करने के लिए इस मंत्र का भी प्रयोग करते हैं “ॐ एं ह्रीम श्रीम् विशुद्धाय फट”।विशुद्धि चक्र को जगाकर किसी भी शक्ति को बुला सकते हैं।
आज्ञा चक्र-इसे थर्ड आई चक्र भी कहते हैं।यह मानसिक शक्ति आध्यात्मिक ऊर्जा,दूरदर्शिता,बुद्धि,अन्तर्ज्ञान का केन्द्र होता है।इसकी असक्रियता से भ्रम और एकाग्रता की कमी देखने को मिलती है।यह बैगनी रंग(वायलेट)का २ दल वाले कमल पुष्प के समान होता है।यह इन्द्रिय ज्ञान का साधन होता है।ब्रेन को संकेत यहीं से प्राप्त होता है;और कार्य निष्पादित होता है।मानसिक स्तर की उच्चता और अन्तर्ज्ञान की अनुभूति यहीं से प्राप्त होती है।जितने चिंतक,विचारक,वैज्ञानिक होते हैं उन्हें यही से ज्ञान विचार प्राप्त होता हैं।इसका बीज मंत्र”ओम”होता है।इसको जागृत करने के लिए यह मंत्र भी उपयोगी होता है।”ॐ हं क्षं चक्र जग्रनाय कलिकाये फट”।
सहस्रार चक्र-इसे क्राउन चक्र के नाम से भी जाना जाता है।यह १००० दलों वाले कमल पुष्प के समान होता है।इसका बीज मंत्र” ॐ”है।इसे जागृत करने का यह मंत्र भी प्रयोग में लाया जाता है।ॐ ह्रीं सहस्रार चक्र जाग्रय जाग्रय एं फट”मूलाधार से होते हुए छ चक्रों को भेदते हुए जब साधक यहाँ पहुँचता है;तो इस केन्द्र की शक्ति का वर्णन कोई नहीं कर पाया है;क्योंकि यहाँ की शक्ति पाकर साधक निर्वचनीय हो जाता है।यहाँ सफ़ेद प्रकाश में ही सब विलीन हो जाता है और साधक को आध्यात्मिकता का गहन ज्ञान,दिव्यचेतना,उच्चतर चेतना और ब्रह्माण्डीय ऊर्जा से जुड़ाव हो जाता है;जिसे सत् चित् आनन्द कहते है।यही ऊर्जा जब साधक को जाप से प्राप्त हो जाती है तो यही अवस्था परमहंस कहलाती है।
साधक योग,प्राणायाम,चक्रों के बीज मंत्र से,सात्विक आहार से और अपनी अच्छी जीवन शैली को अपनाकर चक्रों को जागृत कर सकता है।सातों चक्रों को जागृत करने की एक प्रमुख मुद्रा सुरभि मुद्रा कहलाती है जिसको प्रतिदिन १५-२० मिनट करके सातों चक्रों को सक्रिय कर अपार शक्ति की प्राप्ति संभव है।
लेखक: कई राज्य स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार,वरिष्ठ प्रशिक्षक,ऑल इंडिया रेडियो का नियमित वार्ताकार,शिक्षाविद,मोटिवेशनल स्पीकर और पूर्व अधिकारी है।
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