वायु तत्व है; प्राणाधार (कविता)
पंच महाभूतों में तत्व यह,
बन अदृश्य, है चैतन्यमयी ।
यह सर्वत्र, विराजमान है,
सर्वव्यापी और कालजयी ।।
वायु तत्व, उजागर करता,
दर्शन का वह गुह्य द्वार ।
वायु तत्व श्वासों का प्रहरी,
जीवन जीने का आधार ।।
आत्मा की निर्लिप्त अवस्था,
प्रतिबिम्ब, वायु ही दर्शाती।
क्या अमीर, क्या ग़रीब सबको,
समदर्शन का पाठ पढ़ाती ।।
यह अनन्त विस्तार को देकर,
तत्वों में अद्वितीय कहलाती।
वायु में, असंगता का दर्शन,
अनुपम गुण, सबको हर्षाती।।
है सुगंध को, प्रसरित करती,
तो दुर्गंध को भी, फैलाती।
इसके बिना जीवन संकट में,
सूखा, वर्षा, हरियाली, लाती ।।
यह मानव को शिक्षित करती,
विषय रूपी उपवन को त्याग।
सबको सर्वसुलभ यह होती,
संग न रखती, पीड़ा अनुराग।।
वायु का है,सहज धर्म गुण,
गति प्रसरण का, करती वंदन।
स्थिरता तो, जड़ता ही है ,
वायु तत्व है, चैतन्य स्पन्दन ।।
वायु सिखाती है, जीवन में
समदर्शी बन, हो चलायमान।
श्रम पुरुषार्थ, का बन पतवार,
हो वायु सम, जीवन गतिमान।।
वायु का शुभ संदेश यही है,
लोक से लें, जितना हो काम।
शेष को छोड़े, परहित सेवा में,
संयम से होकर निष्काम ।।
रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा, विज्ञ
सुन्दरपुर- वाराणसी- 221005