एक गीत श्रृंगार का

एक गीत श्रृंगार का 
दर्पण ने सिर फोड़ लिया आगे ही आते,
जलने लगी आग तेरा रंग रूप देखकर।
चंदा शरमा गया ओट बादल की ले ली,
रति का चेहरा बुझा भगी कर हार फेंककर।।
योगी योग हुआ है विचलित तपसी का तप भंग हुआ,
जीवन हुआ निरर्थक सोचें यदि न तेरे संग हुआ।
सूरज की किरणें आ छूती तेरे गाल अधर कच नयना,
धन्य समझती है अपने को कह न पाती कुछ भी बयना।
सारा गात कमल सा लगता सुमुखि तेरा,
भ्रमित भ्रमर मंडराता गुन-गुन घेर घेरकर।।जलने.....
पथिक निहार पंथ को भूले जाता गांव चला दूजे,
भक्त दृष्टि पड़ जाय पूर्व तो तुम्हे भाव भरकर पूजे।
कामी तो पगलाया घूमे कैसे पाऊँ दिनभर सोचे,
पल में रोये हँसे ठठाकर कभी हाथ सिर अपना नोचे।
तेरा रूप कर गया जादू टोना जैसे लोगों पर,
भांटा भिंडी अंतर भूले देख रहे सब उलटफेर कर।।जलने.....
पढ़ने वाली युवा मंडली भूल गई पढ़ना लिखना,
भूला दाम दिखाकर साड़ी किसका है कितना कितना।
चाट बेंचने वाला आता रोज खिलाकर जाता है,
कैसे मांगूँ पैसा इनसे यही समझ न पाता हैं।
किस सांचे में प्रभु ने ढाला किन हाथों से गढ़ा तुझे,
जो ही देखे आहें भरता आँख सेंककर।।जलने........

डाॅ0 रामसमुझ मिश्र 'अकेला'

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