सत्संगति जीवन उद्धार, है कुसंग पतन का सार : डाक्टर दयाराम विश्वकर्मा

सत्संगति जीवन उद्धार, है कुसंग  पतन का सार :  डाक्टर दयाराम विश्वकर्मा 
कहते हैं कि “दुष्ट संग जनि देहि विधाता” हे भगवान दुष्टों का संग कभी मत देना। मनीषियों का भी मत है कि कुसंगति भयानक होती है। कुसंगति से क्लेश उत्पन्न होता है, अशुभ गति प्रदान करता है, उद्वेग और खिन्नता का कारण होता है। बुद्धि को भ्रम में डालता है।  प्राण शक्ति को क्षीण कर देता है और जीवन के तमाम मंगलों को विनष्ट कर देता है। इसीलिए कहते हैं कि दुष्टों की संगति नहीं करनी चाहिए।
रहीम कवि लिखते हैं कि-
वसि कुसंग चाहत कुशल, यह रहीम अफ़सोस।
महिमा घटी समुद्र की, रावण बसो पड़ोस ।।

वहीं तुलसी दास जी लिखते हैं कि-गगन चढ़हि रज पवन प्रसंगा। किचहि मिलही नीच जल संगा।।
अर्थात्, जब धूल पवन का साथ पाती है तो आकाश में उड़ जाती है और वही धूल जब पानी से नीचे मिलती है तो कीचड़ बन जाती है। इसीलिए हमारे मनीषियों ने कहा है कि ”संगत से गुण होत है,संगत से गुण जात।” जैसे पारस पत्थर के समीप लोहा सोना बन जाता है। कोयले के समीप जाने से कालिख़।पुष्प के पास जाने सुगंध।अग्नि की समीपता से तपन और जलन और जल के समीप होने पर शीतलता प्राप्त होती है।स्वाति नक्षत्र की बूँदें जब सीपी में जाती हैं तो मोती बन जाती हैं और यही बूँदें ज़ब सर्प के मुख में जाती हैं तो भयंकर विष बन जाती हैं।
स्वामी विवेकानन्द जी ने संगत का बड़ा अच्छा उदाहरण देते हुए कहा है कि जब वर्षा की बूँदें आसमान से गिरती है तो वह पीने योग्य होती हैं और जब यही गटर में गिरती हैं  तो पीने की बात छोड़िए इससे पैर भी नहीं धो सकते।और जब ये किसी गर्म सतह पर पड़ती हैं तो वाष्प बनकर उड़ जाती हैं । और जब ये कमल के पत्ते पर गिरती हैं तो वह मोती के समान दिखती हैं। इसीलिए उन्होंने कहा है कि हमेशा अच्छे की संगत करने से हम सभी का जीवन रूपांतरित होकर अच्छा बनता है। यह संगत का ही असर है कि जल की बूँदें वही हैं परन्तु जब वे भिन्न भिन्न जगहों पर पड़ती हैं तो उनका स्वरूप भिन्न भिन्न दिखता है। बुरी संगत से व्यक्ति दुख संताप अपमान घृणा एवं निंदा का पात्र बनता है।
वहीं सज्जनों की संगति कुमति को दूर करती है। चित्त में विमलता लाती है। पाप से दूर करती है। सज्जनों की संगति सर्वत्र मंगल ही मंगल का विस्तार करती है। सज्जन व्यक्ति चोरी हिंसा क्रोध झूठ व लोभ से दूर रहते हैं। सज्जन पुरुष संवादी होते हैं वे विवाद से दूर रहते हैं। गीता में कहा गया है कि सज्जन व्यक्ति का आचरण मन वाणी से किसी को कष्ट नहीं देते सत्य और प्रिय बोलते हैं। किसी पर क्रोध नहीं करते और दया और करुणा का भाव रखते हैं। वहीं दुराचारी व्यक्ति की समाज में हर जगह निंदा होती है। वह सदा दुख भोगता है। वह सदा रोगी रहता और उसकी उम्र अल्प होती है वह जल्द ही मर जाता है।”दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः। दुःखभागी च सततम व्याधितोअल्पायुरेव च।।”
यही कारण है कि हमें दुराचारी व्यक्तियों का साथ नहीं देना चाहिए।वशिष्ठ पुराण में वर्णित है कि-आचारहिनम् न पुनन्ति वेदा: अर्थात् आचारहीन मनुष्य चाहे सभी वेदों का अध्ययन कर चुका हो तो भी वह पवित्र और पुण्यात्मा नहीं माना जा सकता। इसीलिए हमारे पूर्वजों का कहना था कि विधाता धन यश वैभव दे; परन्तु दुष्टों का साथ न दे।हमारे शास्त्र भी कहते हैं कि- दुर्जनः परिहर्तव्य: विद्ययालंकृतोअपि सन् ।मतलब चाहे दुष्ट कितना भी विद्वान हो उसका त्याग कर देना चाहिए।मणि से भूषित सर्प क्या कम भयंकर होता है। दुष्ट की संगति उस अग्नि के समान होती है; जो हमारे पुण्य यश धर्म तीनों को जला देती है। इसीलिए हमारे मनीषियों का कहना है कि कुसंग से हमें बचना चाहिए। चाहे अकेले ही रहना पड़े,  वह अकेलापन श्रेष्ठ है; परन्तु दुष्टों का साथ विनाशकारी होता है। ईश्वर से हमे यही प्रार्थना करनी चाहिए।
हमारे शास्त्रों में दुष्ट व्यक्ति के पाँच चिह्न बताए गए हैं। वह अभिमानी होता है।वह कटु और कड़वा बोलता है।वह दुराग्रही ज़िद्दी होता है।दूसरों की बात नहीं मानता।वह अनुशासनहीन अविनयी अवज्ञाकारी और पशुवत् व्यवहार करता है।दुष्ट व्यक्ति व्यसनी आततायी और आत्मघाती प्रवृत्ति का होता है।
हमारे ग्रंथों में ६ प्रकार के आततायियों का उल्लेख मिलता है।पहला विष देने वाला।दूसरा घर में आग लगाने वाला। तीसरा घातक हथियार से आक्रमण करने वाला। चौथा दूसरों का धन लूटने वाला। पाँचवाँ दूसरे की भूमि को कब्जा करने वाला और छठवाँ परायी स्त्री का अपहरण करने वाला।
गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहते हैं कि अभिमान आसुरी सम्पदा वाले व्यक्तियों में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है।इसके अलावा दंभ दर्प क्रोध कठोरता तथा अज्ञान भी ऐसे व्यक्तियों में विद्यमान होता है।
दंभो दर्पो अभिमानश्च, क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम ।।
दुष्ट व्यक्ति संवादी नहीं बल्कि विवादी होते हैं और सदैव दूसरों से लड़ाई झगड़ा करते रहते हैं। दुष्ट व्यक्ति असत्य भाषण, विपरीत धारणा दूसरों में दोष देखना कामभावना की दृष्टि रखना, सदा धनोपार्जनरत रहना, भोगेच्छा क्रोध शोक तृष्णा लोभ चुग़ली डाह हिंसा संताप और शास्त्रों में अरति रखते हैं और कर्तव्यविस्मृत होते हैं। ख़ुद को बड़ा समझना आदि दुर्गुणों से युक्त होते हैं।
वहीं सज्जन व्यक्ति शरीर से सेवा करने वाले,मधुर व्यवहार करने वाले, मन से सभी का भला चाहने वाले और अशांति स्वार्थ हिंसा से परे और अन्याय अनीति अत्याचार से समाज को मुक्त रखने की चेष्टा करने वाले होते हैं।साथ ही अपने समान सभी प्राणियों को देखते हैं और शुभ संकल्पों के साथ सभी का तथा विश्व का कल्याण चाहते हैं।वह पूरे विश्व में शुभता अहिंसा सत्य सद्गुण और ऐश्वर्य की वृद्धि की कामना करते हैं।इसीलिए सारांश में यह कहा जा सकता है कि-
दुर्जन-संगति त्याज्या।सज्जन-संगति ग्राह्या।।

लेखक : कई पुस्तकों का प्रणयनकर्ता, कई राज्यस्तरीय सम्मानों से विभूषित, वरिष्ठ साहित्यकार, प्रशिक्षक, वार्ताकार, शिक्षाविद और सेवा निवृत्त प्रथम श्रेणी का अधिकारी रह चुका है।

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