विवाह में लिए गए सात वचन रस्म नहीं,यह जीवन का पवित्र अनुबंध है : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा

विवाह में लिए गए सात वचन रस्म नहीं,यह जीवन का पवित्र अनुबंध है  : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
              (सात फेरे )
मित्रों ! विवाह दो आत्माओं का मिलन है,जो धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति के लिए किया जाता है।शास्त्रों में विवाह, सोलह संस्कारों में एक अत्यन्त पवित्र अटूट और अध्यात्मिक बंधन माना गया है।यह हिन्दू धर्म में सामाजिक समझौता नहीं है; बल्कि एक पवित्र संस्कार है;जो व्यक्ति को गृहस्थ जीवन में प्रवेश कराकर परिवार व समाज को आगे बढ़ाता है।वंश वृद्धि को बढ़ावा देता है।
शास्त्र कहते हैं कि जो सात कदम साथ साथ चलते हैं वह सखा हो जाते हैं।”सखा सप्त पदा भव”विवाह में भी कन्या कहती है कि तुम मेरे साथ सात कदम चल कर मेरे सखा हो गए हो।एक मित्र एक मित्र के साथ कैसा व्यवहार करता है वही विवाहोपरांत वर कन्या का हो जाता है।हमारे शास्त्र कहते हैं कि”सुमंगली इरम बधू:” तात्पर्य यह बधू सदा सौभाग्यवती रहे।यही बड़े बुजुर्ग लोग भी आशीर्वाद देते हुए बधू को यह कहते भी हैं।वास्तव में विवाह के दौरान लिए गए सात वचनों का जीवन में पालन करने से परिवार में पारस्परिक विश्वास प्यार और सामंजस्य बना रहता है,जो एक सुखी और सफल जीवन की नींव होती है,जिससे दाम्पत्य जीवन सुरक्षा सम्मान और समझदारी से चलता है।
अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेते समय यह कामना की जाती है वर बधू का जीवन तेजस्वी होकर जीवन गतिमान रहे।शास्त्रोक्त जो वचन लिए जाते हैं;अगर उसका पालन किया जाए,तो सचमुच गृहस्थ जीवन स्वर्ग बन जाएगा और अगर भुला दिया जाए तो सात जन्मों का बंधन एक जन्म में ही बोझ लगने लगता है,जो आज बहुत से लोगों के जीवन में दिखता है।
कन्या प्रतिग्रहण(कन्या दान)के समय जो मंत्र पिता से उच्चारित कराया जाता है वह है-
नामने,विष्णुरूपिने,वराय,भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनाम,स्वकीय उत्तरदायित्व भारम,अखिल अद्य तव पत्नीत्वेन,तुभ्यम् अहं सम्प्रददे-ॐ स्वास्ति।
मतलब हे विष्णु रूपी वर मैं तुम्हें अपनी पुत्री का पालन भरण पोषण और सुरक्षा की समस्त ज़िम्मेदारी तुम्हें सौपता हूँ और आज से यह तुम्हारी पत्नी के रूप में दी जाती है।
विवाह में लिए जाने वाले सात वचन सप्तपदी के सात संकल्प माने जाते हैं।शास्त्र के अनुसार अग्नि को साक्षी मानकर वरबधू सात फेरे लेते हैं और हर फेरे के साथ एक वचन लेते हैं।आइए उस पर दृष्टिपात करें।
1-कन्या वर से पहले फेरे में कहती है कि यदि आप तीर्थ यात्रा,व्रत यज्ञ जैसे धर्मानुष्ठान में मुझे साथ लेकर जाएँ तो मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ।यह पहला वचन अन्न और पोषण के लिए होता है।वर कहता है कि तुम घर की लक्ष्मी बनकर अन्नपूर्णा का दायित्व निभाना।पत्नी कहती है कि मैं सदा आपके परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी सहर्ष उठाऊँगी।
2-कन्या दूसरे वचन में कहती है कि यदि आप अपने माता पिता का सम्मान करने के साथ साथ मेरे माता पिता का भी सम्मान करेंगे और परिवार की मर्यादा का पालन करेंगे तो मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ।यह दूसरा वचन शक्ति और सामंजस्य के लिए किया गया है क्योंकि जीवन में यदि संकट आए तो दोनों एक दूसरे की ढाल बनें।वर कहता है तुम मेरे हर दुख सुख में शक्ति बनकर साथ दोगी,मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।बधू कहती है कि मैं भी तन मन से आप का साथ दूँगी और आपदा में भी मैं आप का साथ नहीं छोड़ूँगी।
3-कन्या तीसरे वचन में कहती यदि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं,युवा प्रौढ़ वृद्धावस्था में मेरा पालन पोषण करेंगे तो मैं आपकी वामांगी बनूँगी।यह धन समृद्धि के लिए होता है।गृहस्थी में लक्ष्मी और पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है;जीवन तभी चलता है।वर कहता है कि हम दोनों मिलकर धन उपार्जन करेंगे धर्म के मार्ग पर चल कर,बधू कहती है कि मैं घर के आय व्यय का ध्यान रखूँगी अपव्यय नहीं करूँगी।
4-चौथे वचन में कन्या कहती है कि जब आप परिवार का उत्तरदायित्व और जिम्मेदारियों को निभायेंगे और उसका पालन करनें की प्रतिज्ञा करेंगे तो मैं आप की वामांगी बनने को तैयार हूँ।मित्रों यह वचन परिवार और संतान की जिम्मेदारी हेतु लिया जाता है।साथियों यह दो परिवारों का भी मिलन है।वर कहता है कि तुम मेरे परिवार का आदर करोगी,पितृ ऋण चुकाने में मेरा सहयोग करोगी तो बधू कहती है मैं आपके माता पिता को अपना माता पिता मानूँगी और कुल की मर्यादा को बनाये रखूँगी।
5-इस वचन में कन्या कहती है कि घर के कार्यों में लेन देन या कोई बड़ा खर्च करने से पहले मुझसे सलाह लेंगे तो मैं आपकी वामांगी बनने को तैयार हूँ।यह वचन निर्णय प्रक्रिया और परिवार के सुचारू संचालन के लिए जरूरी होता है।
6-छठे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि आप मुझे दोस्तों सहेलियों या अन्य लोगों के सामने अपमानित नहीं करेंगे और आप स्वम् दुर्व्यसनों जुए आदि से दूर रहेंगे तभी मैं आपकी वामांगी बनने को तैयार हूँ।यह वचन अपमान से सुरक्षा, संयम और नशानुक्ति के लिए लिया जाता है।
7- सातवें वचन में कन्या कहती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और हमारे आपसी प्रेम के बीच किसी तीसरे को भागीदार नहीं बनायेंगे तो मैं आपकी वामांगी बनूँगी।वर कहता है कि तुम भी किसी परपुरुष का विचार नहीं करोगी। यह वचन दोनों के जीवन को पवित्र बनाये रखने के लिये लिया जाता है।हमारे शास्त्र भी कहते हैं-  मातृवत् परदारेषु, लोष्ठवत् पर द्रव्येषु यानि दूसरी स्त्रियों को माता के समान और दूसरे के धन को मिट्टी के समान मानना चाहिए।
मित्रों मेरा तो विचार है कि यदि पति पत्नी मित्रवत् रहेंगे तो सभी रिश्ते निभते चले जाएँगे।जीवन में एक दूसरे को पसंद करना और प्यार करना बेहद ज़रूरी होता है।एक दूसरे की देखभाल करना,एक दूसरे को आराम प्रदान करना,आपसी विश्वास बनाये रखना,शारीरिक मानसिक और भावनात्मक रूप से एक दूसरे के साथ जुड़े रहना,आपसी प्रेम स्नेह यौन सम्बन्ध,एक दूसरे के प्रति सम्मान और प्रतिबद्धता का पालन करना और जीवन में एक स्वस्थ्य संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी अपनी आवश्यकताओं का त्याग भी जरूरी होता है जिससे दाम्पत्य जीवन में तृप्ति का अनुभव होता है।
अगर सारांश में देंखें तो उक्त सात वचनों में वर बधू एक दूसरे के साथ वादा करते हैं- पालन पोषण करने का।रक्षा करने का।आनन्द मनाने का।परिवार वसाने का।मजबूत बने रहने का और ताउम्र प्रेम सम्बन्ध निभाने का।
लेखक: कई पुस्तकों का प्रणयन कर्ता, कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित,  शिक्षाविद, साहित्यकार, वार्ताकार, प्रशिक्षक और प्रथम श्रेणी का अधिकारी रह चुका है।

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