जीवन यात्रा: राम सत्य झूठा संसार एक विचार:- समीक्षक, रांची वि० वि० आचार्य डॉ० गौरीशंकर उपाध्याय
प्राणियों में मनुष्य श्रेष्ठ प्रभु के प्यारे।
निज समझ नहीं दूजे कैसे हो प्यारे।
हम हैं कौन ? कौन हमारे ? हम हमारे ? तुम तुम्हारे ?
माया भेद समझ नहीं पाये।
लखचौरासी जन्म-मरण भरमाये।।
मैं तू छोड़ प्रभु भजन कर पगले
जड़ चेतन प्रभु को हैं प्यारे।। जैसे समझ प्रेम विश्वास ,
तैसे तेरे काज सुलभ हो। अन्तर्यामी अन्तर मन को,
जान कृपानिधि करते हो।।
तेरा सहारा तेरी कृपा,
समझ हमारी तभी सफल हो।।
मैं तू भेद समझे न प्रभु को, सबमें कणकण क्षणक्षण समाये।
पर पीड़ा हित छोड़ क्यों पगले,
,नर तन नाहक जन्म गवाये।कहे थके सब थिर न रहे मन,
जब झेले शिर धुनि पछताये।।
कर्म काल गुण स्वभाव भेद,
जन्म मरण कर्म उपजाये।
राम ही राधा कृष्ण ही राधा, विधि हरि हर गोपी गुण गाये।। ममता मोहित जगत नचाये,
प्रभु माया कोई समझ न पाये।।आध्यात्म समझ
राम सत्य झूठा संसार।
एक विचार एक निष्ठा,
मानव जीवन यात्रा साकार।।
करो सब बाधा निस्तार,
मन दृढ़ करो स्वीकार ।
जीवन व्यर्थ न हो बेकार।।
राधे राधे!! सीताराम!!
जीवन यात्रा
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