जब तक साँसें रहो प्यार से (कविता)

जब तक साँसें रहो प्यार से (कविता)
जलती लाशें बोल रही हैं नहीं साथ कुछ जाना।
जब तक साँसें रहो प्यार से पल भर नहीं ठिकाना।।
तेरा मेरा छोड़ दम्भ का त्याग करें,
प्रभु की सभी सर्जना से अनुराग करें।
अपनी सी ही पीर परायों की समझें,
मजबूरियां निबल असहायों की समझें
वे भी चाह रहे हैं हँसकर अपना दिवस बिताना।।जब तक साँसें.....
पर उपकारी काम करें कुछ समय निकाल,
चिड़ियों के हित पानी बर्तन रखें संभाल।
दिखे राह बिन कांटा फेंंकें ना शरमायें,
तड़प रहे प्यासे पशुओं को नीर पिलायें।
शांति मिलेगी मन को निश्चित पड़ेगा न पछताना।।जब तक साँसें.....
शिक्षा विमुख श्रमिक बच्चों को बिठा पढ़ाओ,
बूढ़े माता पिता बैठकर पैर दबाओ।
सबल निबल जो रहा सता लाठी बन जाओ,
अगर कहीं नारी संकट में लाज बचाओ।
ये मनुष्यता के गुण इनपर पड़ेगा चल दिखलाना।।जब तक साँसे....
बैठ शाम प्रभु शरण भाव से उनको नमन करें,
अपनी अनजानी भूलों का नत सिर हवन करें।
समझें जो कुछ रहा देख हूँ ये तो है मेला,
सबका साथ छूट जायेगा जाना सिर्फ'अकेला'।
फिर खोयें ईमान भला क्यों जब सब कुछ रह जाना।।जब तक साँसें.....

- डाॅ0 रामसमुझ मिश्र 'अकेला'

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