धनोपार्जन के तरिकों से,अभ्युदय व अवनति दोनों संभव : डॉक्टर डी आर विश्वकर्मा
प्रत्येक व्यक्ति अपनी आजीविका हेतु धन का उपार्जन करता है।परिवार का संचालन करने हेतु भी धन की आवश्यकता तो होती है,बच्चों को शिक्षा देने,उनके अन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए धन की आवश्यकता होती है।शास्त्रों में पवित्रता के साथ धन अर्जित करने हेतु तमाम हिदायतें दी गई है।आज के युग में पैसा ही सब कुछ समझा जाने लगा है।कहते भी हैं, कि "सर्वे गुणा कंचनमाश्रयंते"।
यानि सभी गुण धन दौलत में है।
एक बंगाली कहावत भी प्रचलित है, टका ही धर्मः,टका ही कर्मः, टकोही परमम तपः। कहने का अर्थ पैसा ही धर्म,कर्म, व परम तप है।
आज कल यह कहा जाता है,"यस्यस्ति वित्तः स नरःकुलिनः। "यानि जिसके पास धन है,वह आज कुलीन समझा जाता है।आज हम धन को आवश्यकता से अधिक
महत्व देना शुरू कर दिया है।आज धन को सुख का कारक भी मान लिया गया है,परंतु ऐसा है नहीं,यदि धन ही सुख का कारक होता तो धनवान व्यक्ति को सुखी होना चाहिए,
आज तमाम धनी व्यापारी,इफरात धन होते हुए भी,सुखी नही है, नीद की गोली खाकर सोते हैं।
ऋग्वेद में धन के लिए मध,रत्न,रवि, वसु, राध शब्दों का प्रयोग हुआ है।शास्त्रों में नव निधियों की भी चर्चा आती है।
वे है,पद्म,महापद्म,शंख,मकर, कच्छप,मुकुंद, कुंद, नील और खर्व।पहले कागजी मुद्रा प्रचलन में नही थी।पहले हमारे पूर्वज, सत हस्त समाहर,सौ हाथों से कमाते थे,और
सहस्त्र हस्त संकीरः यानी हजार हाथों से उस कमाए धन को बांटते थे।कहते भी है कि अच्छी नियत से कमाया हुआ
धन कितना भी खर्च करो,घटता नही,और खराब नियत से अर्जित धन कभी ठहरता नही,साथ ही दुख का कारण भी बनता है।
हमारे आर्ष ऋषियों ने तो धन के संदर्भ में कहा है, कि "आये दुखम, व्यये दुखम, धीगर्था कष्ट संश्रया"अर्थ कष्ट के
आश्रय धन को धिक्कार है,जिसके आने से भी दुख मिलता है, व जाने से भी दुख होता है।
हमारे मनीषियों ने धन की तीन गतियां बताई है,पहली गति,धन की भोग है।दूसरी गति,दान है।तीसरी गति नाश है।
यदि हम धन का भोग नहीं करेंगे,दान नही करेंगे,तो अंत में धन नाश की ओर चला जाता है।
गृहस्थ की धन,संपत्ति तीन प्रकार की बताई गई है।पहला शुक्ल धन,दूसरा शबल धन और तीसरा असित धन।अपने अपने वर्ण वृत्ति से,स्वधर्म से,न्यायपूर्वक जो भी धन कमाया जाता है,उसे शुक्ल धन कहते है।
"स्व वृत्तुपर्जितम सर्वम सर्वेषाम"
दूसरा शबल धन,यह धन दूसरों की वृत्ति से उपार्जित,तथा उत्कोच(घूस),कर,जो बेचने योग्य नहीं,उसे बेचने से प्राप्त,दूसरे के उपकार के बदले में प्राप्त धन शबल धन कहलाता है।
तीसरा धन होता है,असित धन,यह धन निंदनीय वृत्ति से प्राप्त अशुद्ध तथा छल कपट का होता है,इसे कृष्ण धन,या काला धन भी कहते है।ठगी,बेइमानी,जुआ,चोरी,मिलावट,प्रतिरूपक,डकैती तथा ब्याज आदि से प्राप्त धन काला धन,ब्लैक मनी कहलाता है।
व्यक्ति जिस प्रकार से शुद्ध,अशुद्ध धन से जैसा कार्य करता है,उसका फल उसे उसी प्रकार से मिलता है।यदि पवित्र,शुद्ध,न्यायोपर्जित द्रव्य से कोई काम किया जाता है,तो उसका फल, इहलोक,परलोक,सर्वत्र कल्याण कारक और सर्व प्रकार से अभ्युदय करने वाला होता है।
यदि शबल धन से कोई कार्य किया जाता है,तो उसका फल मध्यम कोटि का होता है,किंतु यदि कृष्ण धन से,अन्याय उपार्जित धन से कार्य किया जाता है तो लाभ की अपेक्षा हानि,सफलता की अपेक्षा असफलता,अभ्युदय की अपेक्षा अवनति होता है।इसीलिए कहते है कि काला धन सब प्रकार से निंद्य एवम त्याज्य होता है।शास्त्रों में इसकी निंदा की गई है।
हमारे मनीषियों ने उत्तम धन यानी सात्विक धन, मध्यम धन यानी राजसिक धन व अधम धन यानी तामसिक धन।इन तीन प्रकार के धनों में सात्विक धन कमाने का उपक्रम करने का उपदेश दिया है,जिससे व्यक्ति की प्रगति होती है। किसी कार्य की सफलता व सिद्धी के लिए धन,द्रव्य की शुद्धि परमावश्यक है।अन्याय से उपार्जित धन न इस लोक में कीर्ति देता है,न परलोक में।
अन्यायउपार्जितनैव द्रव्येण सुकृतम कृतम।
न कीर्ति इहलोके च परलोके न तत्फलम।।
देवी भागवत का दृष्टांत है कि,जब वेद व्यास ने महाराज जन्मेजय को देवी की कृपा प्राप्ति के लिए यज्ञ करने को कहा,और यह भी बताया की कार्य की सिद्धि और पूर्ण सफलता के लिए धन की ,द्रव्य की,शुद्धि परमावश्यक है।अन्याय से कमाए धन से कार्य की सिद्धि नही होती।
आगे वेद व्यास जी ने दृष्टांत देते हुए जन्मेजय को बताया कि राजेंद्र! पांडव सदाचारी थे,महाराज युधिष्ठिर धर्मराज थे,
धर्म के ही अवतार थे,उन्होंने राजसूय नामक महायज्ञ कराया। यज्ञ की समाप्ति पर प्रचुर दक्षिणायें बांटी गई, उस यज्ञ में साक्षात कृष्ण पधारे,भारद्वाज आदि महान ऋषियों का आगमन हुआ,पवित्र वेद ध्वनियों से आहुतियां दी गई,विधि विधान से यज्ञ संपन्न हुआ,पूर्णाहुति भी हुई।भाव में भी कोई अशुद्धि नही हुई,किंतु उस यज्ञ में जिस धन का
प्रयोग हुआ था,वह लूट पाट का धन था,शुद्ध धर्म के मार्ग से
प्राप्त नहीं था,वह कृष्ण धन था,इसीकरण पांडवों को अत्यंत कष्टप्रद वनवास भोगना पड़ा। महामहिषी पांचाली(द्रौपदी) को विपत्ति झेलनी पड़ी।राजा विराट के घर नौकरी करनी पड़ी,सब प्रकार से कष्ट ही कष्ट झेलना पड़ा।
अतः इस दृष्टांत से यह शिक्षा मिलती है कि वृत्तोपर्जन में शुद्धता वरतनी चाहिए।
काला धन विनाश ही नही,सर्वनाश का कारण बनता है।सब
पवित्रताओं में अर्थ की पवित्रता श्रेष्ठ है।मनुष्य देखा जाय तो अर्थ का दास है,कहते भी हैं,"अर्थस्य पुरुषो दासः "।भरथरी हरि ने भी लिखा है,सर्वे गुणा कांचनमश्रयांते।यानी सारे गुण कंचन में बसते है।वैसे भी देखे तो अर्थ की चमक किसी काल मे धूधली नही हुई है,अर्थ की महत्ता हर देश काल में रही है।
मनुष्य मनुष्य का दास नही,धन का दास है। बड़ाई छोटाई ,धन, अधन के निबंध से होती है।जो धन नीतिपूर्वक कमाया जाता है,उसे अर्थ कहते है,और जो धन अनीति पूर्वक कमाया जाता है उसे अनर्थ कहते है।अनर्थ सदा ही अनर्थकारी ही होता है।इस सूक्ष्म भेद को आज लोग नही समझ पाते,इसी कारण समाज में अनेक समस्याएं हैं।पहले लोग आयु में बड़े लोगो का सम्मान करते थे,आज लोग आय में बड़े का महिमा मंडन करते हैं।
याद रखिए अन्याय पूर्वक कमाया धन यदि किसी के पास टिकता है तो वह दस वर्ष ही,ग्यारहवें में उसका समूल नष्ट हो जाता है।यैसा हमारे मनीषी कहते हैं।
इस काल खंड में हम धन को इतना महत्व दे दिया है की पैसे से रिश्ते टिक रहे हैं।पैसे पर ही व्यवहार चल रहें हैं।आज जिसके पास धन नहीं है,वह दुखी और लाचार दिख रहा है।धन की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता परंतु धन हमे सात्विक ढंग से कमाने की चेष्टा करनी चाहिए।अन्यथा अन्याय से कमाया धन सब चीजों को नष्ट कर देता है।इसी लिए हमारी संस्कृति में शुभता के साथ धन कमाने की हिदायत दी गई है। कारण यही है कि हम शुभ पहले और लाभ बाद में लिखते हैं।
लेखक: प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी, कई पुस्तकों का प्रणयन कर्ता, कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित वरिष्ठ साहित्यकार, वार्ताकार एवं शिक्षाविद् है