राम तुम्हीं उद्धारक हो, उपकारक हो (कविता)

राम तुम्हीं उद्धारक हो, उपकारक हो 
                 (कविता) 
तुम्हीं समाये सर्वत्र,धरती के कण कण में।
सार्थक सुखद होना,ठहर जाना,सब मन में ।

राम है अन्तर्निहित,प्राण में अविरल धारा।
यथा विराम विश्राम में,जैसे जीवन सारा ।

रमने को जो विवश करे,तुम वही राम हो ।
जीवन शान्ति प्रदायक हो,तुम वही राम हो।

राम है साक्षी हर वासी के,जीवन घट का।
पीड़ा में निकले शब्द,अरे राम,स्वर सबका।

लज्जा वश हम सब,हाय राम ही कहते हैं ।
अशुभ अवसरों पर,राम राम सब कहते हैं ।

राम ही जनमानस का,राग है,समवेत स्वर।
अभिवादन व आदर संग,राम ही राम मुखर।

शपथ में भी,राम दुहाई,अपनाया हम सबने।
राम भरोसे ही रहना,जब अनिश्चितता पनपे।

राम वाण कहते हैं,जब लक्ष्य अचूक रहा ।
मृत्योपरांत हम सबने,जब शब्द राम कहा ।

जीवन में हम राम को पग में,लाते अपनाते।
राम शब्द दुःखभंजक है,हम सब गाते जाते।

निर्बल के भी राम,सभी मन को यह भाता ।
राम कथा का सार,है जीवन सफल बनाता।

राम पुनर्नवा औषधि है,हमारे तन मन अंदर।
जो अच्छा है,वही सुखद है,शाश्वत सुन्दर ।

घोर निराशा में,जो उर उठता वही राम है ।
बचता जो कुछ,लूट जाने पर वही राम है।

राम नाम ही लेकर,असंख्य मुनि महान हुए।
कई तो ज्ञानी ध्यानी,कवि और विद्वान हुए ।

आओ धरा बचाओ और हम सबको प्रभुवर।
पुनर्प्रतिष्ठित राम राज्य,फिर करो धरा पर।

हे प्राण व मान के रक्षक,तुम उपकारक हो।
जीवन रेखा के मान बिन्दु,तुम विस्तारक हो।

तेरा सबको साथ मिला,वह अपकर्ष नहीं है ।
बिना तुम्हारे,जीवन में,सचमुच उत्कर्ष नहीं है।

रचनाकार : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा, विज्ञ
  सुन्दरपुर- वाराणसी- 221005

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