बदलते गाँव
(कविता)
प्रगति के इन आयामों में,
कितने बदल गए अब गाँव।
प्रेम और भाईचारे की,
ख़त्म हुई,पुरातन छाँव।।
कुएँ ताल तलैया के,
जल सेवन की बीती बात।
हर बस्ती पुरवे में,पहुँचा,
सरकारी नल की सौगात।।
लेकिन पंच परम्परा का,
ख़त्म हुआ वह,पीपल छाँव।
प्रगति के इन आयामों में,
कितने बदल गए अब गाँव।।
कच्चे घर अब नहीं दिखे,
सबके अब पक्के हैं,वास।
पतिया मुनरी जुवेदा के,
पक्का बना,अपना आवास।।
सरकारी अभियान से संभव,
सबको छतों की पक्की छाँव।
प्रगति के इन आयामों में,
कितने बदल गए अब गाँव ।।
घर घर बना,अब शौचालय,
जल निकास का हुआ प्रबन्ध।
गंदी नाली से निजात अब,
दूर गंदगी और दुर्गंध ।।
गली गली बिछ गया खड़ंजा,
दिखे न कीचड़ युत अब पाँव।
प्रगति के इन आयामों में,
कितने बदल गए अब गाँव ।।
जल निकास,जल संरक्षण से,
दिखती है,अब हरियाली ।
ग्राम्य विकास की,व्यवस्था से,
लौट रही है,खुशहाली ।।
पहले वाली पगडंडी से,
मुक़्त हुआ,अब गाँव गिराँव।
प्रगति के इन आयामों में,
कितने बदल गए अब गाँव।।
घरों घरों में,दृश्यमान है,
सोलर पैनल इन्वर्टर।
झाड़ फूंक की कमी हुई,
जादू टोना और मंतर।।
ईर्ष्या द्वेष जनित,अब झगड़े,
नहीं दिखे,अपनत्व की छाँव।
प्रगति के इन आयामों में,
कितने बदल गए अब गाँव।।
रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
“विज्ञ”सुंदरपुर वाराणसी-०५