पथिक ढूँढते छाँव
(कविता)
गैस चैम्बर, बना भूमण्डल।
सूर्य ताप से, मचा बवंडर।।
पशु पंक्षी व लता वल्लरी,
सूने से अब गाँव…..पथिक ढूँढते छाँव।।
ओज़ोन परत में, छेद हुआ।
माइक्रोब्स, है मरा हुआ।।
कटते वृक्षों की, बददुआ से
मिले न कोई ठाँव…..पथिक ढूँढते छाँव।।
सन्तुलन, प्रकृति का खोया।
हमने खुद, काँटों को बोया ।।
कुदरत, यदि वीरान हुई तो,
झुलसे,गाँव गिराँव…..पथिक ढूँढते छाँव।।
वृक्ष रोपण का, पीटे ढिंढोरा।
मकसद केवल, सदा छिछोरा।।
हरीतिमा सम्बर्धन की बात तो
कौवों का बस काँव…..पथिक ढूँढते छाँव।।
जलती धरती, तपती धरती।
उर अन्तर में केवल परती ।।
मन, कर्म, वचन, सब दूषित,
बन्द गली में पाँव…..पथिक ढूँढते छाँव ।।
कैसे भला हो, कैसे मंगल ।
कंक्रीट के, दिखते जंगल।।
जल, जंगल और जमीन पर
है, विकास का दाँव…..पथिक ढूँढते छाँव।।
रचनाकार : डॉ डी आर विश्वकर्मा ”विज्ञ”
सुन्दरपुर वाराणसी-05
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