सर्वाधार से विनती (कविता)

सर्वाधार से विनती (कविता) 
हे प्रभु इस देह में, हर्ष की रफ़्तार भर दे,
दूर हो सब स्वार्थ कटुता, भक्ति का तू ज्वार भर दे।।

हर कदम पर हो ख़ुशी, मन में तरंगित भावना।
मेरे मन मंदिर दया का, अनवरत उद्गार भर दे ।।

इस नीरस मेरी गिरा में, शक्ति दो इतनी प्रबल,
मेरी वाणी हो मधुर, यह भाव अपरम्पार भर दे ।।

जब मिलू,जिससे मिलू, दिल रहे यह बाग बाग,
दृष्टि उज्ज्वल हो सदा, प्रेम इतना प्यार भर दे ।।

पीड़ितों को देखकर, दूँ सहारा त्वरित हम,
शक्ति इतनी इन भुजाओं में, ईश सर्वाधार भर दे।।

ज्ञान है मिथ्या जगत का, तन भी क्षण भंगुर मगर,
इस क्षणिक जीवन में भी, दीप्ति परमोदार भर दे।।

कर्म मेरा हो सुफल, अन्याय से होकर विरत,
जब धरा पर दो जनम, यह सिलसिला हर बार कर दे।।

रचनाकार : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा ”विज्ञ”
              सुन्दरपुर, वाराणसी-05

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