“लोभ” अधिक पाने की अंतहीन अतृप्त इच्छा व पापों का मूल : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
मित्रों! जीवन में दुख का कारण चाह,इच्छा,कामना ही होती है।आकांक्षा यद्यपि प्रगति व विकास की जननी तो मानी जाती है;परन्तु दुख का भी वही कारण है।आकांक्षा,अहं और लोभ को जन्म देती है।अहं से क्रोध और संघर्ष पैदा होता है।जब तक संसार में लोभ,आकांक्षा और संग्रह वृत्ति बनी रहेगी,शोषण का यह चक्र कभी समाप्त नहीं हो सकता।
लोभ को पाप का जड़ कहा जाता है।किसी वस्तु धन या सत्ता को आवश्यकता से अधिक पाने की तीव्र लालसा को लोभ कहते हैं।इसे लालच,तृष्णा,स्पृहा भी कहते हैं।यह एक ऐसी मानसिक अवस्था है,जो व्यक्ति के पास जो कुछ है;वह उससे संतुष्ट नहीं होता और लगातार अधिक की चाहत में उलझा रहता है।यह एक प्रकार की कभी न खत्म होने वाली भूख है।यह एक ऐसी मानसिक बीमारी है,जहाँ व्यक्ति जितना अधिक पाता है,उसकी इच्छा और भी ज़्यादा बढ़ जाती है।लोभ में जो कुछ हमारे पास है उसके छीन जाने का भी भय होता है।लोभ के कारण ही व्यक्ति कितना भी धन पद सुख क्यों न प्राप्त कर ले वह आंतरिक रूप से हमेशा अशांत और असंतुष्ट ही बना रहता है।
हमारे शास्त्रों में लोभ को बुराइयों का मूल माना गया है,जिससे काम क्रोध मोह मद बढ़ता है।अधिक की लालसा के अंधी दौड़ में व्यक्ति सही ग़लत का निर्णय नहीं कर पाता और नैतिकता की सीमाओं को भी लाँघ जाता है।लोभी व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं होता।ये अत्यधिक स्वार्थी,कंजूस, दूसरों का शोषण करने वाले,दूसरों को धोखा देने वाले होते हैं।इनमें स्वाभिमान की भी कमी होती है।
अब आइए कुछ ग्रंथों में लोभ के सन्दर्भ में जो कुछ लिखा है उस पर ध्यान केंद्रित करें।सर्वप्रथम गीता में अध्याय 16 का श्लोक 21 लोभ को वर्णित करते हुए लिखता है-
त्रिविधम नरक स्येदम द्वारम नाशनमतमानः।
कामः क्रोध:स्तथा लोभस्ततत्रयम त्यजेत ।।
अर्थ-काम(वासना/इच्छा)क्रोध(गुस्सा)और लोभ(लालसा)ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले(पतन की ओर ले जाने वाले)हैं।अतः मनुष्य को इन तीनों का त्याग करना चाहिए।
उक्त तीनों से ही हत्या चोरी झूठ का आविर्भाव होता है।
हितोदेश और भोज प्रबन्ध का लोभ के सन्दर्भ में एक अति प्रसिद्ध श्लोक है,जो इस प्रकार है-
लोभत्क्रोधःप्रभवति,लोभात्काम:प्रजायते।
लोभन्मोहश्च,नाशश्च लोभ:पापस्य कारणम।।
अर्थ-लोभ(लालच)से क्रोध उत्पन्न होता है।लोभ से ही काम(वासना इच्छा)जागृत होती है।लोभ से मोह(अज्ञान/भ्रम)
और व्यक्ति का नाश होता है।अतःलोभ ही समस्त पापों का कारण होता हैं।
महाभारत वन पर्व में-यक्ष युधिष्ठिर संवाद में यक्ष नेयुधिष्ठिर
से पूछा कि पाप का कारण क्या है(किंस्विद पाप कारणम)तो वहाँ भी युधिष्ठिर ने कहा-लोभ:पापस्य कारणम।
विदुर जी भी धृतराष्ट्र को समझाते हुए कहते हैं कि संतोष ही सबसे बड़ा सुख और लाभ है।मनुष्य को बार बार लोभ करने के बजाय संतोष की इच्छा करनी चाहिए,जिसे सर्वोच्च संतोष की प्राप्ति हो जाती है वही उत्तम पुरुष है।
रामायण में कैकेयी का लोभ ही राम के वनवास का कारण और दशरथ के मृत्यु का कारण बना,जिससे अयोध्या वीरान हुई।रावण ने लोभ के कारण ही अपनी सोने जैसी लंका को नहीं बचा पाया । इसीलिए कबीर दास जी ने लिखा- साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम्ब समाय।मैं भी भूखा न रहूँ,साधु न भूखा जाय।।
गुरु वाणी कहती है- “लोभ लहरि अति नीझर बाजै” यानि लोभ की लहर ऐसी है जैसे तेज बहाव जो सब कुछ बहा ले जाता है।
गरुण पुराण में लोभी मनुष्य के बारे में कहा गया है- लोभी पुरुष: दानं न ददाति,सत्यं न वदति, धर्मम् न आचरति।यानि लोभी मनुष्य न दान देता है।न सच बोलता है।न धर्म करता है,क्योंकि वह सोचता है कि यह सब करने से मेरा धन घट जाएगा।
चाणक्य ने भी लिखा है कि लोभी व्यक्ति कभी सत्य, न्याय या धर्म का पालन नहीं कर सकता और वह सदा दूसरों की सम्पत्ति पर बुरी नज़र रखता है।वह कहते हैं कि- लुब्धस्य नाश्यति यश: तात्पर्य लोभी का यश नष्ट हो जाता है।
पतंजलि योग सूत्र- 2.34 में वर्णित है- “वितर्का:हिंसादय:कृतकारित-अनुमोदिता:लोभ क्रोध मोह पूर्वका: मतलब हिंसा आदि वितर्क लोभ क्रोध मोह से होता है। लोभ पहले आता है।
सम्पत्ति और राज्य के अत्यधिक लोभ के कारण ही कौरवों ने पांडवों के साथ छल किया ,जिसका परिणाम उनके सम्पूर्ण वंश के विनाश के रूप में निकला।लोभ से विनाशकारी ही परिणाम प्राप्त होता है।
कहते भी हैं कि- लोभ पाप का मूल है, पाप नरक का द्वार।
पाप से बचिये बंधुओं, भजिये सिरजनहार ।।
भगवान शिव ने कहा है- संतोषम् परमम् सुखम।
लेखक: अवकाश प्राप्त प्रथम श्रेणी के अधिकारी, कई पुस्तकों के लेखक, कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित साहित्यकार, प्रमुख वार्ताकार व शिक्षाविद है।