विवाह है क्या?आज बच्चों का विवाह;माता पिता के लिए एक समस्या व मौन संघर्ष क्यों? डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा

विवाह है क्या?आज बच्चों का विवाह;माता पिता के लिए एक समस्या व मौन संघर्ष क्यों? डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
            विवाह (शादी) 
शादी में दो जीवन,दो परिवारों और पीढ़ियों का भविष्य बंधा होता है।इसीलिए इसे दो आत्माओं का कभी एक पवित्र बंधन माना जाता था;परन्तु आज यह अभिभावकों की परीक्षा ज़्यादा बन गई है।मित्रों सर्वप्रथम तो विवाह क्या है? उस पर दृष्टिपात करना समीचीन होगा,तो आइये विवाह पर ध्यान दें ।विवाह वह क्रिया संस्कार विधि पद्धति है जिससे पति पत्नी के स्थायी सम्बन्ध का निर्माण होता है या यूं कहें कि समाज द्वारा अनुमोदित,परिवार की स्थापना करने वाली किसी भी पद्धति को विवाह कहते हैं। विवाह एक सांस्कृतिक रीति रिवाज,स्नेह,सामंजस्य और संतानोत्पत्ति का माध्यम है।शादी दो व्यक्तियों के बीच एक पवित्र, सामाजिक और कानूनी रूप से मान्यताप्राप्त बन्धन है, जो जीवनभर के लिए प्रेम विश्वास और प्रतिबद्धता का प्रतीक माना जाता है। इसमें पति पत्नी आपसी अधिकार जिम्मेदारियां एवं सामाजिक मान्यता प्राप्त करते हैं। विवाह से यौन संतुष्टि,श्रम विभाजन,आर्थिक उत्पादन, उपभोग व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति,समजीकरण,वंशानुक्रम का नियमन होता है।
शास्त्रों में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं। पहला ब्रह्म विवाह-उत्तम गुणों और कुल वाले वर से माता पिता की सहमति से वैदिक रीति से जो विवाह होता है,उसे ब्रह्म विवाह कहते हैं।दूसरा दैव विवाह-यज्ञ या धार्मिक कार्य के बदले ऋत्विज(पंडित)को कन्या दान देना दैव विवाह कहलाता है।तीसरा आर्य विवाह-वर से एक या दो गाय बैल लेकर कन्या का विवाह करने को आर्य विवाह कहते हैं।चौथा प्रजापत्य विवाह-पिता द्वारा वर बधू को साथ रहने और गृहस्थ धर्म का पालन करने के आदेश देते हुए कन्यादान करना।पाँचवाँ असुर विवाह-वर पक्ष से धन लेकर कन्या का विवाह करना।छठवाँ गन्धर्व विवाह-वर बधू का आपसी प्रेम और सहमति से विवाह करना इसमें माता पिता की सहमति आवश्यक नहीं।सातवाँ राक्षस विवाह-बल पूर्वक छल से या युद्ध से पराजित करके,कन्या का अपहरण करके,किया जाने वाला विवाह। आठवाँ पैशाच विवाह-सोती हुई,नशे में धूत या अचेत अवस्था में कन्या से ज़बरदस्ती विवाह करना इसमें आता है।यह सबसे निम्न कोटि का विवाह माना जाता है।
मनु ने विवाह संस्कार को २५ वर्ष के बाद ही करने का निर्देश किया है-द्वितीय मायुषो भागम् कृतदारो गृहे बसेत।
पहले एक विवाह,बहु विवाह,बहु पत्नी विवाह,विनिमय विवाह,आदर्श विवाह,प्रेमविवाह,अन्तर्विवाह इत्यादि प्रकार के विवाह होते थे;लेकिन समलैंगिक विवाह की प्रथा नहीं थी जो आज कई देशों ने मान्यता दे रखी है।
पहले रिश्ते होते थे।आज रिश्ते नहीं सौदे होते हैं।आज के आधुनिक परिवेश में बहुत कम माँ बाप में हिम्मत बची है,जो अपने बच्चों के इजाज़त के बगैर विवाह तय कर दें।पहले संस्कार,परिवार की पहचान और ख़ानदान देखकर अपनी समझ से शादियाँ हुआ करती थीं।आज रूप नौकरी पैसा कार बंगला देखकर विवाह संपन्न हो रहें हैं।लड़की के माँ बाप चाहते हैं कि परिवार छोटा हो,पैसे वाला दामाद हो। पहले कहते थे कि हमारी बेटी घर के सभी काम करती है आज कहते हैं कि हमने अपनी बेटी से कोई काम नहीं कराया है।आज रिश्ते नहीं,बेहतर की तलाश हो रही है।
घर परिवार झूकने से चलता है,आपसी प्यार और सहयोग से तालमेल से चलता है।अकड़ने से परिवार नहीं चलते।
आज घरों में सब कुछ है टीवी है,कूकर है,वॉशिंग मशीन है परन्तु शांति कोशों दूर हो चुकी है।मित्रों आज की बहू कल सास बनेगी यक़ीन मानिए किए हुए कर्मो का हिसाब,व्याज सहित लौट कर आता है।परिवार में जब दोनों कमाएंगे तो अहंकार टकरायेंगे ही।वही आज बहुतायत पति पत्नी की समस्यायें हैं।
आज अभिभावकों के लिए अपने बच्चों की शादी एक गंभीर समस्या बन गई है।कारण बच्चे २५ वर्ष तक तो पढ़ाई करने में व्यस्त रहते हैं।इसके बाद ३ वर्ष तक करियर सेट करने में गुज़र जाते हैं,तब तक २८-३० की अवस्था हो जा रही है।क़रीब २-३ वर्ष शादी ढूँढने में गुज़र जा रहा है तब तक कई बच्चे बच्चियाँ ३०-३५ की उम्र पार कर जा रहें हैं,ऐसे में अभिभावकों को चाहिए कि जब बच्चे २२ वर्ष के हो जाएँ तभी से उनसे उनकी शादी की बात करनी शुरू करें और उनकी अपेक्षाएँ जाने और उनसे खुल कर बात करें;क्यों कि हमारे मनीषियों का कहना है कि जब बच्चे १६ वर्ष के हो जाए तो,उनके साथ मित्रवत् व्यवहार करना चाहिए।इससे काफ़ी हद तक बच्चों के विवाह २७-२८ आते आते तय हो जाया करेंगे और अभिभावकों की समस्याएं कुछ हद तक दूर हो जाएगी यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है वैसे तो शादी में अनेकानेक समस्याएं आती हैं।कभी वर पक्ष की ओर से तो कभी बधू पक्ष की तरफ़ से।जब तक शादी हो न जाए शादी के दौरान अनेकों अड़चने आती रहती हैं।
आज सोशल मीडिया पर डेस्टिनेशन वेडिंग,परफ़ेक्ट कपल की रील्स देखकर बच्चों की उम्मीदें सातवें आसमान पर चली गईं हैं और माता पिता इससे भी काफ़ी निराश होते हैं जब बच्चे कहते हैं कि फला लड़के या लड़की की शादी देखिए कैसे उनके माता पिता ने शानदार तरीके से की।कुछ माता पिता तो अपनी झूठी शान के लिए कर्ज़ लेकर भी शादी करके जीवन भर कंगाल हो जा रहे हैं।
आज के दौर में साइबर फ्रॉड,फ़ेक प्रोफ़ाइल,तलाक की खबरें पढ़ कर सुन कर माता पिता १०० बार शादी से पहले वेरिफिकेशन करते हैं कि कहीं मेरी एक गलती बच्चे के जीवन को बर्बाद न कर दें क्योंकि आज के परिवेश में section 498 A IPC/BNS section 85 और Domestik Violence Act 2025 की धारायें जो( पति या उनके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता)के लिए आपराधिक कानून है जो दहेज़ या अन्य कारणों से विवाहित महिला के उत्पीड़न पर तीन साल तक की सजा देता है।वहीं पर DV Act घरेलू हिंसा से महिलाओं को संरक्षण देता है इसके अलावा भी भरण पोषण के भी तमाम प्रावधान किए गए हैं जिससे आज अभिभावकों के लिए अपने बच्चों की शादी एक तरह की समस्या बनती जा रही है।
जिस दिन मेरी मर्जी और समाज की मर्जी के बीच परिवार की मर्जी आ जाएगी,उस दिन से शादी की आधी समस्याएं अपने आप हल हो जाएगी।
अब आइये वैवाहिक समस्याओं के निज़ात हेतु त्रिस्तरीय समाधान पर चर्चा कर ली जाए।पहला बच्चों के स्तर पर-बच्चे, पैकेज के स्थान पर,एक बेहतर इंसान तलाशें ।क्योंकि बेतन तो बैंक में जाता है।स्वभाव घर में रहता है।बच्चों को माँ बाप को दुश्मन नहीं समझना चाहिए।बच्चों को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि उनके माता पिता का कई दशकों का अनुभव होता है;उन्हें अपने तीन माह के जिद के सामने न डिगाएँ।शादी इवेंट नहीं जिम्मेदारी है यह समझ बूझ कर निभाने से चलता है।इसमें धैर्य की जरूरत होती है।शादी भागना नहीं,निभाना होता है।
समाज के स्तर पर-हम सभी को सादगी के साथ शादी करनी चाहिए।दिखावे में आकर,कर्ज़ लेकर शादी नहीं करनी चाहिए।सभी से आग्रह है कि तुलना करना बंद करें हर घर की स्थितियाँ परिस्थितियाँ अलग अलग होती हैं।तलाक को तमाशा बनाने की कोशिश न करें;समस्या आए तो तत्काल सुलह समाधान करें।
परिवार के स्तर पर-बच्चों की उम्र जब २२ की हो तभी उनके विवाह के बारे में बात विचार शुरू करें।उनकी अपेक्षाएँ जानें और तदनुसार उनकी शादी हेतु विचार विमर्श शुरू करें।
बच्चों को भरोसा दें कि वे उनके साथ हैं।बोझ न बनें।ताना ना दें।उन्हें संस्कारी बनायें।उन्हें समझायें कि शादी इन्स्टेंट काफ़ी की तरह नहीं है।साथियों विवाहोपरान्त पति पत्नी के जीवन में अनेक उतार चढ़ाव आते रहते हैं, उन्हें साथ साथ मिलकर सुलझाने का प्रयास करना चाहिए ;जैसे चलो कहानी साथ शुरू करते हैं वाली कहावत कही जाती है।

लेखक:कई पुस्तकों का लेखक,कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित, साहित्यकार,वार्ताकार और शिक्षाविद एवं प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है।

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