'अनुरोध' (कविता)
व्यर्थ-सा लगने लगा है,
वर्जनाओं का सघन पथ
सारथी जीवन के रथ के तुम!
तनिक अब ध्यान रखना।
हाथ में वल्गा तुम्हारे, दीखते घबराए हो तुम।
साथ में सहचर लिए पर, लग रहे अकुलाए क्यों तुम?
ज्ञात तुमको हो गये हैं,
दुःसह सच संबंध के पर,
हो सके तो समर्पण की
वेदना का मान रखना।
सुर तुम्हीं ने तो दिया था, स्वप्न की उद्विग्न लय को।
फिर नया जीवन दिया था शुष्क सी निस्तेज वय को।
तोड़ सकते तंतु हो विश्वास के,
अनुबंध के पर,
प्रणय के मृतवत अधर पर,
चेतना का गान रखना।
सारथी जीवन के रथ के तुम, तनिक अब ध्यान रखना।।
सारथी जीवन के रथ के तुम, तनिक अब ध्यान रखना।।
- रश्मि लहर
लखनऊ-226002
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