प्रकृति का न्याय, धूप हवा पानी की तरह;लोक में बुद्धि का वितरण भी समान रूप से : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
बुद्धि एक ऐसी मानसिक क्षमता है जो तर्क करने,योजना बनाने,समस्याओं को हल करने और अमूर्त रूप से सोचने व अनुभवों से सीखने में मदद करती है।यह प्रकृति द्वारा प्रदत्त मानव को एक अद्भुत उपहार/वरदान है।बुद्धि सोचने,समझने की शक्ति,सही ग़लत में भेद करने की क्षमता और किसी भी परिस्थिति से तालमेल बिठाने का सामर्थ्य भी प्रदान करती है। शास्त्रों में इसे इस प्रकार से वर्णित किया गया है-“बुद्धयेत अनेन इति बुद्धि:” मतलब जिससे निश्चय किया जाए,उसे बुद्धि कहते हैं। यह बुद्धि ही है, जो कहती है, यही किया जाये और बाक़ी को छोड़ा जाए। यह बुद्धि ही है,जो हमे पशुओं पक्षियों से अलग करती है। पशु भूख लगने पर केवल खाता है। मनुष्य सोचता है; क्या खाऊँ? कितना खाऊँ? कब खाऊँ?-यही बुद्धि का फ़र्क है,जो हमें जानवरों से, अलग करती है। प्रकृति का संविधान; समानता का होता है। यह किसी के साथ, पक्षपात नहीं करती, जैसे-सूरज सबके लिए उगता है। सूरज की धूप, हवा, पानी सभी के लिए समान रूप से मय्यसर होती है; उसी प्रकार प्रकृति ने बुद्धि का वितरण भी सबके लिए समान, बराबर में वितरित किया है। लगभग 68% लोग संसार में सामान्य बुद्धि के होते हैं, जिनकी बुद्धि लब्धि 100-120 के बीच की होती है। केवल 2.5% लोग ही मिट्टी के माधव, मूर्ख, गधा, कम बुद्धि वाले होते है। और इतने प्रतिशत के आस पास ही,लोग जीनियस,प्रखर बुद्धि वाले होते हैं । जिस तरह से प्रकृति की वर्षा राजा के महल व ग़रीब की झोपड़ी दोनों जगह एक जैसी होती है। वर्षा हर खेत में समान रूप से होती है, वैसे ही न्यायिक रूप से प्रकृति ने सभी को,बुद्धि का वितरण समान रूप से किया है, उस पर आरोप नहीं लगाया जा सकता।जन्म के समय हर शिशु लगभग समान क्षमता लेकर पैदा होता है, कोई तेज व धीमा नहीं होता। वैज्ञानिक तथ्य है कि दुनिया के किसी कोने में जन्में बच्चों को, अगर समान अवसर, पोषण और शिक्षा मिले तो वह डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार, वैज्ञानिक और बहुत कुछ बन सकता है। तो प्रश्न उठता है कि फिर एक बच्चा दूसरे से कालान्तर में, कैसे पिछड़ जाता है। साथियों फर्क बुद्धि से नहीं संस्कार, मेहनत, दिशा और अवसर से आता है।
वॉटसन नाम का मनोवैज्ञानिक कहता था कि Give me a child, I can make him doctor, lawyer and dacait also. आप मेरी बात को समझ गए होंगे।
तीन चींजे बुद्धि को आकर देती है-पहला परिवार- जिस भी घर में सवाल पूछने की आज़ादी होती है, वहाँ बुद्धि का विकास होता है। जहाँ चुप रहो कहा जाता है, वहाँ बच्चों की बुद्धि दब जाती है। उनका विकास, उनकी बुद्धि का विकास बाधित होता है। दूसरा शिक्षा- अच्छे शिक्षक, अच्छी किताबें, अच्छा वातावरण, माहौल बच्चों की बुद्धि में अभिवृध्दि करती हैं। तीसरा संघर्ष- परेशानियाँ संघर्ष बुद्धि के विकास में आशातीत वृद्धि करती हैं।आराम बुद्धि को सुस्त बना देती है।जिद और जनून भी कुछ हद तक व्यक्ति को असाधारण सफलता दिलाता है, इसीकारण कभी कभी मज़दूर का बेटा भी IAS बन जाता है और अमीर का बेटा आराम तलवी की वजह से कुंद हो जाता है। यह आम लोगों का भ्रम है कि फला बच्चा होशियार है और फला कमज़ोर ऐसा कदापि नहीं, केवल अवसर की अनुपलब्धता,मेहनत की कमी,दिशा का अभाव ही,ऐसी परिस्थिति पैदा करते हैं।आज बहुतायद अभिभावकों ने बुद्धि को,मार्कशीट और पैकेज से तौलना शुरू कर दिया है।जो गणित में तेज होता है;उसे प्रायः जीनियस कह देते हैं,और जो बच्चा मिट्टी से अच्छी कृति बना देता है,कला में तेज होता है,उसे कम बुद्धिमान,नालायक़ कह दिया जाता है;जब कि ऐसा नहीं है।
बुद्धि को वैज्ञानिकों ने 4 प्रकार का बताया है।पहला तार्किक बुद्धि-स्कूलों में गणित विज्ञान तर्क इत्यादि इसका उदाहरण।दूसरा भावनात्मक बुद्धि-जिसमें रिश्ते बनाना,गुस्सा करना,उसका नियन्त्रण करना दूसरों को समझाना आदि इसका उदाहरण।तीसरा सामाजिक बुद्धि-इसमें समाज के साथ चलना,नेतृत्व करना,टीम बनाना इत्यादि इसमें आता है।चौथा रचनात्मक बुद्धि-इसमें रचनात्मकता का समावेश होता है।समस्याओं का हल निकालना,कुछ नया सृजन करना, निर्माण करना इत्यादि इसका उदाहरण है।
हमारे मनीषियों ने कहा है कि केवल बुद्धि से ही सफलता नहीं प्राप्त होती।तेज दिमाग़ कभी कभी ख़तरनाक भी हो सकता है,जब वह चरित्र के बाहर हो।असली सफलता बुद्धि और चरित्र के संयोग से ही प्राप्त होती है।आज जो फ्रॉड घपले घोटाले साइबर क्राइम सब तेज दिमाग़ का परिणाम हैं,जब बुद्धि का ग़लत इस्तेमाल होता है,तभी यह सब पैदा होते हैं ;क्योंकि यहाँ पर चरित्र का अभाव होता है,यही वजह है कि प्रकृति ने बुद्धि के साथ विवेक भी प्रदान किया है।जिसको जितना विवेक उसकी बुद्धि उतनी ही सार्थक होती है।कहते है कि प्रकृति ने बुद्धि का वितरण जाति धर्म से उपर उठकर,गाँव,शहर,अमीर,ग़रीब सभी को समान रूप से किया है।कई विद्वानों का कहना है कि बुद्धि प्रकृति का दिया गया ऋण है-इसे व्याज सहित समाज को लौटाना चाहिए।यदि तेज बुद्धि हो और ग़लत दिशा मिल गई तो व्यक्ति अपराधी बन सकता है,और यदि तेज दिमाग़ को सद दिशा मिल जाए,तो व्यक्ति महापुरुष हो सकता है।यही कारण है कि हम सबसे पहले चरित्र निर्माण पर ध्यान देते हैं।वेद पुराण आयुर्वेद में बुद्धि के चार स्तरों का जिक्र किया गया है।पहला धी,मेघा,प्रज्ञा और बुद्धि अब आइए इनका अन्तर समझें।धी को ग्रहण शक्ति कहते हैं।मेघा धारण और स्मरण शक्ति को कहते हैं।ऐसा देखने में आता है कि,बहुत से बच्चे धी में तेज और मेधा में कमज़ोर होते हैं।कुछ पढ़ते ही भूल जाते हैं।प्रज्ञा विवेक और निर्णय शक्ति को कहते हैं ,जिसे श्रेष्ठ ज्ञान भी कहा जाता है।”प्रकृष्टा ज्ञानं इति प्रज्ञा”ऐतरेय उपनिषद में आता है-“प्रज्ञानम् ब्रह्म” यानि प्रज्ञा ही ब्रह्म कहलाता है।इसीलिए कहते हैं कि बिना प्रज्ञा के बुद्धिमान लोग भी ग़लत निर्णय ले लेते हैं।अब आइये संकल्प शक्ति को भी समझ लें जब आप के पास कई विकल्प होते हैं तो आप इसी संकल्प शक्ति के सहारे किसी एक को विकल्प को चुनते हैं।
अब आइये बुद्धि लब्धि क्या है? उस पर प्रकाश डालें।किसी व्यक्ति की मानसिक योग्यता, तर्क शक्ति और समस्याओं के समाधान की क्षमता का एक संख्यात्मक माप को बुद्धि लब्धि (आई क्यू) कहा जाता है,इसका संप्रत्यय सबसे पहले 1912 में जर्मन मनोवैज्ञानिक विलियम स्टर्न ने दिया था।इसे निकालने का सूत्र है कि मानसिक आयु को, वास्तविक आयु से, भाग देकर 100 से गुणा करने पर प्राप्त होता है, मानक परीक्षणों में 100 को सामान्य या औसत बुद्धि का माना जाता है। बुद्धि लब्धि आधार पर लोगों का विवरण-
बुद्धि लब्धि के अनुसार 140 बुद्धि लब्धि वाले अति प्रतिभाशाली, 120-139 वाले प्रखर बुद्धि के, 110-119 वाले उत्कृष्ट बुद्धि वाले,90-109 वाले सामान्य बुद्धि वाले , 80-89 वाले मंद बुद्धि के, 70-79 वाले सीमांत बुद्धि के और 70 से कम वाले अल्प बुद्धि के या बौद्धिक अक्षम कहलाते हैं।
लेखक: साहित्यकार, वार्ताकार, शिक्षाविद और प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है।
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संपादकीय/बुद्धि का वितरण