साहित्य क्या है? हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाएँ और उसके काल खंडों का संक्षिप्त विवेचन डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा

साहित्य क्या है? हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाएँ और उसके काल खंडों का संक्षिप्त विवेचन   डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा                   
साहित्य शब्द का शाब्दिक अर्थ-हित सहित अर्थात् जिसमें सबका हित या कल्याण छिपा हो। साहित्य भाषा भाव और समाज के कल्याण का एक सुंदर संगम है,जिसके माध्यम से मन की भावनाओं और अनुभवों को कलात्मक रूप से व्यक्त किया जाता है।हिन्दी भाषा और साहित्य का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है, जिसकी उत्पत्ति संस्कृत प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के विकास से हुई है। इसका विकास सिर्फ़ भाषा का नहीं बल्कि भारत की आत्मा का इतिहास रहा है।वास्तव में हिन्दी साहित्य का लक्ष्य मानव ही है।साहित्य संस्कृति इतिहास और मानवीय जीवन को गहराई से दर्शाता है।यही कारण है कि साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है।
हिन्दी साहित्य के चार प्रमुख कालों का वर्णन करना मित्रों यहाँ समीचीन है,तो आइये इन कालों पर हम ध्यान दें।
पहला काल आदि काल(1050-1375 ईसवी)इसे वीर गाथा काल भी इस लिए कहा जाता है कि इस काल में राजाओं की वीरता और शौर्य का वर्णन किया जाता था।यह तत्समय के साहित्य में देखा जा सकता है।जैसे चंद्र वरदाई द्वारा रचित पृथ्वी राज रासो,नर पति नाल्ह द्वारा सृजित बिसल देव रासो,दलपति विजय द्वारा लिखी गई खुमान रासो,जगनिक द्वारा लिखा गया आल्हाखण्ड और परमाल रासो इत्यादि साहित्य लिखे गए।इस काल को सिद्ध सामन्त काल,चारण काल भी कहा गया है।इस काल की विशेषता यह रही है कि इस दौरान हिन्दी अपभ्रंश से निकलकर अपने पैरों पर खड़ी हुई।
दूसरा काल,भक्ति काल(1375-1700 इसवी)का है,जिसमें ईश्वर भक्ति और प्रेम की प्रधानता बढ़ी।राजाओं की तलवारें जब थक गई,मुस्लिम आक्रमण से निराशा फैली थी,तो लोगों में भक्ति का संचार होना शुरू हुआ,इसीकरण इस काल को हिन्दी का स्वर्ण युग भी कहा जाता है।इस काल में भक्ति की दो धाराएँ चली। पहला निर्गुण भक्ति-जिसमें कबीर गुरुनानक रैदास जिन्होंने अपने साहित्य से,जाति पाति तोड़ी।दूसरी सगुण भक्ति-जिसमें सूर तुलसी जायसी जिन्होंने अपनी रचनाओं से लोक को मर्यादा सिखाई।इस काल में लोक भाषा अवधी सधुक्कड़ी ब्रज भाषा का विकास हुआ।
तीसरा रीति काल(1700-1900 ईसवी)इस काल को श्रृंगार काल भी कहा जाता है,क्योंकि इस काल में श्रृंगार की प्रधानता थी; जिसमें नायक नायिकाओं का भेद,उनका नख शिख से वर्णन किया जाता था।इस काल में रीति ग्रंथों की रचना हुई।जिसमें बिहारी केशव भूषण मतिराम आदि महत्वपूर्ण साहित्यकार हुए थे।यह हिन्दी साहित्य का विवादास्पद काल कहा जाता है,लेकिन कला की दृष्टि से यह सबसे समृद्ध काल माना जाता है।इस काल में अलंकार प्रियता,दरबारी संस्कृति,चाटुकारिता और वीरता का अतिरंजित वर्णन किया गया।
आधुनिक काल(1900-अब तक का काल)जिसमें गद्य की प्रधानता है।इसीकरण इसे गद्य काल भी कहते हैं।इस काल में खड़ी बोली का विकास और समाज सुधार की भावना का विकास शुरू हुआ।इस काल को प्रमुखतया 03 भागों में विभाजित किया जा सकता है।पहला भारतेन्दु युग जिसमें आधुनिक हिन्दी का विकास शुरू हुआ।दूसरा द्विवेदी युग आया जिसमें भाषा का परिष्कार शुरू हुआ और तीसरा छायावाद और छवादोत्तर युग जिसमें भावनाओं का आकाश निर्मित हुआ,जय शंकर प्रसाद,सुमित्रानन्दन पंत,निराला,महादेवी वर्मा आदि कवियों ने अपनी अपनी भूमिकाएँ निभाई।तत्पश्चात् प्रगतिवाद और प्रयोगवाद ने अपना अस्तित्व क़ायम किया; जिसके बाद साहित्य महलों से निकल कर झोपड़ी तक आ पहुँचा।
साथियों! हिन्दी साहित्य की दो प्रधान विधाएँ पद्य और गद्य की रहीं हैं,जिस पर हिन्दी साहित्य का वटवृक्ष इन्हीं दो शाखाओं पर टीका नज़र आता है।अब आइये इन पर प्रकाश डालें।मित्रों गद्य ही मानव की प्रारम्भिक भाषा रही है,मानव जब बोलना शुरू किया तो वह गद्य में ही बोलना शुरू किया।गद्य से ही हम अपने भावों को स्पष्टता से व्यक्त कर पाते हैं।गद्य हमारी स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।गद्य के माध्यम से ही हम अपने जीवन में सभी कार्यों को सम्पन्न करते हैं।यदि देखा जाए तो हमारे भावों विचारों की सरल स्वाभाविक अभिव्यक्ति गद्य के द्वारा ही होती है।गद्य का प्रयोग व्याख्या तर्क वर्णन एवम् कथा के लिए भी किया जाता है।गद्य में किसी तत्व की सहजता सरलता व स्पष्टता से व्याख्या करने की क्षमता होती है;इसीकरण सामाजिक साहित्यिक वैज्ञानिक आदि समस्त विषयों के लिखने का माध्यम प्रायः गद्य ही रहा है। कारण यही है कि गद्य को कविनाम निकषम वदन्ति कहा गया है।अब आयिए हिन्दी साहित्य में गद्य की तमाम विधाओं पर विचार करें।निबन्ध-किसी निश्चित विषय पर अपने विचारों को क्रम बद्ध तरीके से लिखना।नाटक-मंच पर अभिनय करने के लिए लिखी गई कथा जिसमें कई अंक होते हैं।एकांकी-एक ही अंक वाला छोटा नाटक।उपन्यास-जीवन के कई फलक और कई पात्रों की कहानियों वाला विस्तृत गद्यरूप।जीवनी-किसी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति के जीवन का परिचय जिसे दूसरा लेखक लिखता है।आत्म कथा-जब लेखक स्वम् अपने जीवन की कहानी लिखता है।संस्मरण-किसी व्यक्ति या घटना की यादों के आधार पर लिखा गया लेख।रेखाचित्र-शब्दों के ज़रिए किसी व्यक्ति वस्तु या घटना का ऐसा सजीव वर्णन करना कि चित्र सामने आ जाए।रिपोर्टाज़-किसी घटना का कलात्मक और आँखों देखा हाल।आलोचना-किसी साहित्य रचना के गुण दोष के आधार पर निष्पक्ष समीक्षा।यात्रा वृत्तांत-किसी यात्रा के दौरान अनुभवों का रोचक वर्णन।डायरी-दिन प्रतिदिन के अनुभवों और विचारों को तिथिवार लिखना।पत्र साहित्य-महान लोगों द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण पत्रों को पुस्तक के रूप प्रकाशन।वार्ता-बातचीत या संवाद पर आधारित साहित्य।
आइए! अब पद्य पर भी विचार करें।साहित्य की वह विधा जिसमें लय ताल छंद तुकबंदी और विशेष भावों की प्रधानता होती है उसे पद्य(कविता या काव्य) कहते हैं।रसात्मकम वाक्यम काव्यम कहा जाता है;यानि रस युक्त वाक्य ही काव्य कहलाता है।काव्य दो प्रकार का होता है श्रव्य और दृश्य काव्य,दृश्य काव्य को नाटक भी कहते हैं।अब थोड़ा काव्यों के भेद पर भी दृष्टिपात करें।महाकाव्य-में जीवन या युग चित्रण।खण्ड काव्य- में जीवन की एक घटना का काव्यात्मक वर्णन होता है। मुक्तक काव्य- में एक छंद में पूर्ण भाव समाहित होता है। गीत गजल भी आधुनिक काल की लोकप्रिय विधा के रूप में आज खूब प्रचलित हुआ है।पद्य रचना सभी के वश की बात नहीं।इसमें प्रतिभा शक्ति संस्कार और अभ्यास की आवश्यकता होती है।पद्य में छंद अक्षर ह्रस्व दीर्घ शिल्प अलंकार आदि का बंधन होता है।
सारांश में पद्य हिन्दी साहित्य का हृदय है,तो गद्य उसका मस्तिष्क कहा जाता है।मित्रों जो रचना मानव को दुर्गतिहीनता ,परमुखापेक्षिता से न बचाए उसके मस्तिष्क को परदुखकातर व संवेदनशील न बनाये वह साहित्य नहीं है।

लेखक : साहित्यकार, वार्ताकार, कई पुस्तकों के प्रणयनकर्ता, कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित, पूर्व प्रथम श्रेणी का अधिकारी है।

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