अनुशासन बंधन नहीं:बल्कि सार्थक जीवन का पथ प्रदर्शक : डॉक्टर डी आर विश्वकर्मा

अनुशासन बंधन नहीं:बल्कि सार्थक जीवन का पथ प्रदर्शक :  डॉक्टर डी आर विश्वकर्मा
अनुशासन में, अनु का मतलब-पीछे चलना और शासन का अर्थ नियम है।अनुशासन का सीधा अर्थ हुआ;नियमों के अधीन रहना या खुद को नियंत्रण में रखना।
 मित्रों ! अनुशासन वास्तव में वह अदृश्य धागा है, जो मनुष्य के बिखरे हुए जीवन को, मोतियों की माला की तरह, पिरोने में सक्षम होता है। वेदों में अनुशासन के लिए कहा गया है ”ऋतस्य पन्था” ऋत के मार्ग पर चलो।ऋत का अर्थ होता है सृष्टि का अनुशासित नियम।कुछ मनीषियों ने ”अनुशासनम् परम् तप:” कहा गया है।अनुशासन का मतलब शरीर और मन को साधना होता है,और सधे मन से,सही कार्य करना धर्म कहलाता है।अब आइए थोड़ा और अन्तर को समझने का प्रयास करें।धर्म अनुशासन को अर्थ प्रदान करता है।फ़ौज का अनुशासन धर्म से जुड़ा हुआ है।देश की रक्षा सम्मानीय माना जाता है।लेकिन जेल का अनुशासन डर से पैदा होता है।आप प्रतिदिन समय से उठते हैं,सही समय पर सब कार्य करते हैं,और किसी का भला नहीं करते,तो यह आप का अनुशासन हुआ।यह धर्म नहीं है।और यदि आप सबका भला चाहते हैं और ख़ुद आलसी हैं,समय पर काम नहीं करते,तो यह मात्र आपकी इच्छा है,धर्म नहीं। 
मनुस्मृति में धर्म के 10 लक्षण बताए गए हैं।आइए इस पर भी ध्यान दें;क्योंकि इसके कुछ प्रविधान भी अनुशासन के लिए बहुत जरूरी होते हैं।
धृति: क्षमा दमोस्तेयम, शौचमिन्द्रीयनिग्रह:।
धीरविद्या सत्यमक्रोधो,दशकम धर्म लक्षणम्।।
आइए!इसका अर्थ समझें।
धृति-धैर्य रखना।कठिन समय में भी विचलित न होना।क्षमा-दूसरों के अपराधों को माफ़ करना और बदले की भावना न रखना।दम-मन को बश में रखना।बुरे विचार न आने देना।अस्तेय-चोरी न करना।दूसरे की वस्तु पर बिना अधिकार के लोभ न करना।शौच-शरीर और मन दोनों की पवित्रता यानि बाहर और अन्दर दोनों जगह पवित्रता रखना।इन्द्रिय निग्रह-इन्द्रियों को ग़लत रास्ते पर जाने से रोकना।धी-बुद्धि से काम लेना,समझदारी से निर्णय लेना।विद्या-ज्ञान प्राप्त करना,अज्ञान में न रहना।सत्य-सच बोलना,सच का आचरण करना।अक्रोध-क्रोध न करना।गुस्से को क़ाबू में रखना।
व्यक्ति चाहे किसी पंथ संप्रदाय वर्ण जाति का हो यदि उक्त को ध्यान में रखकर अपना आचरण करता है तो वह धार्मिक और अनुशासित होता है।
जीवन में सफलता,चरित्र निर्माण और मानसिक शांति के लिए अनुशासन बेहद जरूरी होता है।आइए!अनुशासन के निम्न प्रकारों पर ध्यान केंद्रित करें। पहला नैतिक अनुशासन-इसका सम्बन्ध हमारे चरित्र मूल्यों और सही ग़लत की समझ से होता है।यह समाज परिवार और स्वम् के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभाने की प्रेरणा देता है।समाज के नियमों ईमानदारी सच्चाई और न्याय के मार्ग के बिना किसी बाहरी दबाव के चलना ही नैतिक अनुशासन है।जैसे सत्य बोलना,ईमानदारी के रास्ते पर चलना।दूसरों के अधिकारों भावनाओं और सम्मान का ध्यान रखना।लालच भ्रष्टाचार और ग़लत कार्यों से ख़ुद को दूर रखना।इससे समाज स्वस्थ्य समाज में बदलता है।
आत्म अनुशासन-इसे आंतरिक अनुशासन भी कहा जाता है।इसका सम्बंध मन विचारों भावनाओं पर नियंत्रण रखने से होता है।यह सबसे कठिन अनुशासन होता है।इसमें अपनी इच्छाओं गुस्से आलस्य और ध्यान भटकाने वाली चीजों पर काबू पाकर अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना होता है।इससे मुश्किल परिस्थितियों में भी धैर्य बनाये रखना और भावनाओं में न बहना।दैनिक कार्यों को समय से पूरा करना।टालमटोल न करना।अपनी कमजोरियों को पहचान कर उन्हें सुधारने का निरन्तर प्रयास करना।कहते हैं कि बिना आन्तरिक अनुशासन के जीवन के बड़े लक्ष्यों को नहीं प्राप्त किया जा सकता।दुनियाँ के महापुरुष आत्म अनुशासन से ही महानता को प्राप्त करते हैं।
शारीरिक अनुशासन-इसका सम्बंध शरीर की देखभाल सेहत 
और भौतिक आदतों से होता है।हमारा शरीर हमारी सभी गतिविधियों का आधार होता है।इसे अनुशासित रखना बेहद जरूरी होता है।शरीर को स्वस्थ सक्रिय और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए एक निश्चित और स्वस्थ्य दिनचर्या का पालन करना शारीरिक अनुशासन के अन्तर्गत आता है। रोजाना योग व्यायाम या शारीरिक श्रम करना, पौष्टिक और संतुलित आहार लेना,जंक फूड से बचना,समय पर सोना और जागना,उचित आराम करना,जिससे शरीर बीमारियों से दूर रहता है।शरीर को पर्याप्त ऊर्जा मिलती है।कहा भी गया है कि”स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य मस्तिष्क का वास रहता है।जब हमारा शरीर स्वस्थ्य रहता है और मन शांत और केंद्रित रहता है तो,हम सही ग़लत का फैसला बेहतर तरीके से करने में समर्थ होते हैं।
सामाजिक अनुशासन-सामाजिक गतिविधियों को संपन्न करने हेतु हमें नाना प्रकार के अनुशासन को ध्यान में रखना होता है।जैसे-कतार बद्ध होकर दर्शन करना।ट्रैफ़िक नियमों का पालन करना।समय पर कार्यालय पहुंचना इत्यादि।जिन समाजों में सामाजिक अनुशासन नहीं होता,वहाँ सामाजिक अव्यवस्था बनी रहती है,जो राष्ट्र के लिए भी हानिकारक होता है।ऋग्वेद में सामाजिक अनुशासन के लिए हमारे आर्ष ऋषियों का चिंतन इस श्लोक में बख़ूबी वर्णित किया गया है।  “संगच्छद्ववम संवध्वम् सं वो मनांसिजानताम” जिसका अर्थ हम साथ साथ चले,साथ साथ बोले।हमारे मन एक साथ अनुशासित रहें;यही इस ऋग्वेद के मंत्र का निहितार्थ है।वैचारिक अनुशासन में,मन में क्या सोचना है और क्या नहीं सोचना है,इसका विवेक जागृत करना होता है।किसी बुरे कार्य को करने का विचार सर्वप्रथम मन में आता है फिर विचार और आचरण में ढलता है,इसीकारण से वैचारिक अनुशासन जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है।यद्यपि चंचल मन को वश में करना अत्यधिक कठिन होता है परन्तु इसे निरन्तर प्रयास अभ्यास से एवं आसक्ति को छोड़कर इसे बश में किया जा सकता है।
गीता में एक श्लोक का वर्णन मिलता है जो हमें अनुशासन की बख़ूबी सीख देता है।यह निम्न प्रकार है।
युक्ताहार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु।
युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।। इसका अर्थ जो मनुष्य खान पान,आमोद प्रमोद और मनोरंजन तथा कर्तव्यों को करने में चेष्टा तथा सोने जागने में,संयम रखता है,उसका योग सभी दुखों का नाश करने वाला होता है।गीता का यह श्लोक यह संदेश देता है कि हमें जीवन में सन्तुलन सुख शांति और साधना के लिए अनुशासन की अत्यन्त जरूरत है।

लेखक:कई पुस्तकों का प्रणयनकर्ता, कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित वरिष्ठ साहित्यकार, आल इण्डिया रेडियो का नियमित वार्ताकार, चिंतक, शिक्षाविद और प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है, जिसके नाम से शिक्षा संकाय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शोध छात्रों को डॉक्टर डी आर विश्वकर्मा बेस्ट पेपर अवार्ड दिया जाता है।

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