पुरानी तस्वीर
समय सदा गतिशील प्रबल,
कभी न रुकता किसी के लिए।
एक तस्वीर ही जो समय को,
बांध देती सभी के लिए।
खुद की देख पुरानी तस्वीरों को,
वह वक़्त सुनहला याद आता।
समय विशेष में कब क्या था?
वह वक़्त विशेष मन भाता।
आज अगर हम जवां हुए हैं तो ,
बचपन की तस्वीर का क्या कहना,
खिलौने अपने सच्चे मित्र थे,
दिन भर केवल मस्ती करना।
आज हैं अपने पिचके गाल,
धनुष सी झुकी पतली कमर।
बाॅल क्रिकेट की कैच करते थे,
कमज़ोर हो चली अपनी नज़र।
देख तस्वीरों में खुद को अपने,
फिर से वैसा बनना चाहें।
गुज़रा वक़्त वापस ना आता,
तस्वीरों में बस बसना चाहे।
कवि- चंद्रकांत पांडेय,
मुंबई / महाराष्ट्र