घटता जल स्रोत ( कविता)

घटता जल स्रोत
जल के घटते स्तर पर, 
आओ सभी विचार करें।
नैसर्गिक जल स्रोतों का,
आओ मिल उद्धार करें।।
              
वर्षा की प्रायिकता में, 
हुआ आज खरमण्डल है।
आज प्रदूषण दंश जाल से,
त्राहि - त्राहि भूमंडल है।।  
हे भगवन! अब मानवता का, 
तुमही बेड़ा पार करें। 
नैसर्गिक जल.....

पृथ्वी के फटने की घटना,
कई क्षेत्र से आती हैं।
प्रकृति कोप की है सूचना,
यही हमें बतलाती है।।
ताल,तलैया,पोखर का,
आओ मिल उद्धार करें ।
नैसर्गिक जल .......

भू-जल का गिरता स्तर,
हमें यही  बतलाता है।
७० सेमी प्रति वर्ष,
यह पृथ्वी के नीचे जाता है।।
जल स्रोतों पर बने भवन को,
जल्दी से अवसान करें। 
नैसर्गिक जल .....
 
जो जल के स्रोतों को पाटे,
समझो जल अपराधी है।
शुद्ध नीर के क्षय को रोको,
जल की यह बर्बादी है ।।
कहीं किसी गृह,स्थल पर,
जल का न अपमान करें।
नैसर्गिक जल .....

पहले बड़े बड़े मटकों में,
जल संधारण करते थे ।
जल में वरुण देवता बसते,
पूर्वज माना करते थे ।।
जल के संरक्षण के ख़ातिर,
सख़्त नियम विधान करें।
नैसर्गिक जल ......
धरती पर बारिश की बूँदें,
प्रभु की बड़ी अमानत है।
जो जल के महत्व न समझे,
ऐसों को बस लानत है ।।
जल सम्बर्धन,अभियान को,
सब मिलजुल कर, संधान करें।
नैसर्गिक जल स्रोतों का, 
मिल कर अब उद्धार करें ।।

रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा, विज्ञ

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने