पर्व, उत्सव, त्योहार हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत व जीवनी शक्ति के द्योतक : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा

पर्व, उत्सव, त्योहार हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत व जीवनी शक्ति के द्योतक  : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा 
भारत विविध धर्मों और संस्कृतियों का देश कहा जाता है,जो ऋषि और कृषि प्रधान भी रहा है।भारतीय संस्कृति में हजारों त्योहार मनाये जाते हैं,इसमें राष्ट्रीय धार्मिक क्षेत्रीय व फ़सलोत्पादन के बाद मौसमी त्योहारों को मनाने की परम्परा सदियों से अस्तित्व में है; जिसमें होली, दिवाली, पोंगल, ओणम, विजय दशमी, दुर्गा पूजा,  गणेश चतुर्थी, मकर संक्रांति, वैशाखी इत्यादि बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार होते हैं। राष्ट्रीय पर्व में स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गांधी जयंती मनाने का विधान है तो वहीं धार्मिक त्योहारों में दीपावाली, होली, दशहरा, जन्माष्टमी ईदुलफितर, गुरुपर्व, महावीर जयंती, क्रिसमस, रक्षा बंधन व छठ पूजा आदि मनाए जाते हैं। क्षेत्रीय मौसमी फसल त्योहारों में मकरसंक्रांति (उत्तरभारत) पोंगल (तमिलनाडु) ओरण(केरल) बिहू (आसाम) वैशाखी( पंजाब) होली (यूपी) नुआखाई (उड़ीसा) पौष मेला (बंगाल) लोसर ( लद्दाख, सिक्किम) तोर्ग्या (अरुणाचल प्रदेश) के अलावा कुछ प्रमुख सांस्कृतिक उत्सवों में सूफ़ी संगीत समारोह नई दिल्ली, रण उत्सव कच्छ की खाड़ी गुजरात, त्रिशुर पुरम केरल, गोवा कार्निवल गोवा, हम्पी उत्सव व मैसूर दशहरा महोत्सव कर्नाटक, कोणार्क नृत्य महोत्सव, तोशाली राष्ट्रीय शिल्प मेला व पूरी बीच महोत्सव उड़ीसा, काला घोड़ा कला महोत्सव महाराष्ट्र, पुष्कर ऊँट मेला पुष्कर जयपुर साहित्य महोत्सव जयपुर राजस्थान प्रमुख हैं।
पर्व उत्सव त्योहार भारतीय संस्कृति के ताने बाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं; जिसमें देश की कलात्मक प्रतिभा पाक कला और संगीत की प्रेरणादायी झलक भी देखने को मिलती है। पर्व और उत्सवों को इसीकारण जीवनी शक्ति के रूप में भी देखा जाता है।
होली का पर्व हर्षोल्लास का पर्व माना गया है। होली इसे हुली, होली, होलिका, हुलका व होलाका के भी नाम से पुकारा जाता है। कल्प द्रुम नामक शब्द कोष में वर्णित है-
“तृणाग्निभृष्ट:अर्धपक्व शमी धान्यम होलक:” यानि आधे पके हुए तिनकों की अग्नि में भुने हुए फली वाले अन्न को होला होरहा या होलक कहा जाता है। इसी संकल्पना से होलिका दहन भी अस्तित्व में आया।
इसे बसंत ऋतु के उत्सव के रूप में मनाया जाता है जिसे मदनोत्सव भी कहते हैं। यह बुराई पर अच्छाई का,घृणा पर प्रेम का और अंधकार पर प्रकाश की जीत का त्योहार भी माना गया है। यह पर्व फ़ाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस समय रबी की फसलें पक कर तैयार हो जाती हैं। कहा तो यह भी जाता है की किसान लहलहाती फसलों को देखकर आनन्दित होते हैं और उसी ख़ुशी में यह त्योहार मनाया जाता है।इस समय लोग फसल की फलियों को आग में भूनकर खाते हैं  जिसे होलक होरा होरहा होला के नाम से भी जाना जाता है, परन्तु पुराणों में इसे कई किंवदंतियों से जोड़कर रख दिया गया है। राजपूताना के लोग इसे प्रह्लाद हिरणकश्यप और हिरणकश्यप की बहन होलिका की कथा से जोड़कर देखते हैं और होली मनाते हैं ।तो पूर्वी भारत के लोग इसे पूतना और कृष्ण को लेकर मानते हैं। वही महाराष्ट्र और कोंकण में भविष्य पुराण की एक कथा ढूँढी राक्षसी से जोड़कर इस पर्व को मनाते हैं।
दम्पत्ति चतुर्थी नामक ग्रन्थ में वर्णित है कि चार मुख्य जातियों के लिए चार त्योहारों का उल्लेख मिलता है, ब्राह्मण के लिए रक्षाबंधन का उपकर्म उत्सव क्षत्रियों के लिए विजयादशमी, वैश्यों के लिए दीपावली का त्योहार और शूद्रों के लिए होली का त्योहार कहा गया है परन्तु यह सत्य नहीं है अब सभी लोग सभी त्योहार मिलजूल कर मनाते हैं। अभिज्ञान शाकुन्तलम्, मालविका आर्य और हर्ष कृत रत्नावली में भी होली का वर्णन मिलता है। हिन्दी साहित्य में चर्चित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सम्राट हर्ष के काल खण्ड का वर्णन करते हुए लिखा है कि कामिनियाँ होली के दिन नशे में होकर मधुपान करके राजमार्गों पर निकलती थीं और उनके सामने कोई भी पुरुष आ जाता तो उसे केसर मिश्रित फूलों के रंगों से सराबोर कर देती थीं। इससे सड़के रंगीन हो जाती थीं। नारद पुराण में एक श्लोक आता है-
“फाल्गुने पौर्णियाम तु होलिका पूजनम् स्मृतम्” यानि फाल्गुन की पूर्णिमा को होलिका पूजन का विधान होता है।
व्रतोत्सव चन्द्रिका नामक ग्रन्थ में होली के राख को देह पर लगाने का उल्लेख मिलता है।
वन्दितासी सुरेंद्रेण ब्राह्मणा शंकरेण च,
अस्तत्वम् पाहि मॉम देवि भूति भूति प्रदाभव:।
जिसका अर्थ होता है हे होली तुम्हारी पूजा इन्द्र ब्रह्मा शंकर करते हैं तुम मेरी भी रक्षा कर,ऐश्वर्य प्रदान करो।
होली का त्योहार मनाने के कई कारण बताए गए हैं १-हिरण्यकश्यप प्रहलाद और होलिका वाली कथा के अनुसार २-शिव जी की तपस्या कामदेव द्वारा भंग करने वाली कथा और सती का उनके विवाह का विवरण के साथ ।कहा तो यह भी जाता है कि भोलेनाथ रंगभरी एकादशी के दिन काशी में पार्वती जी को लेकर विवाहोपरान्त पधारे तो नगर वासियों ने उनका गुलाल अबीर से स्वागत किया था।इसीकारण काशी में होली रंगभरी एकादशी से शुरू होकर ६ दिन खेली जाती है। 
इसी प्रकार अन्य त्योहारों के मनाने की परंपरा भारतीय संस्कृति में वर्णित है।
लेखक:कई राज्य स्तरीय पुरस्कारों से विभूषित वरिष्ठ साहित्यकार शिक्षाविद और प्रमुख वार्ताकार,इसके साथ ही प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी भी रह चुका है।

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