परम पुरुष भगवान विश्वकर्मा
विश्वपति ! जग के उपकारी।
सुन लो अब,प्रार्थना हमारी ।।
अस्त्र-शस्त्र,देवों की नगरी ।
रचे ब्रह्माण्ड की,रचना सारी ।।
दो संज्ञान,भटकते कुल को ।
नाव पड़ी,मझधार हमारी ।।
पढ़े लिखे,जो अपने कुल के ।
हो सद बुध,हो कृपा तुम्हारी।।
तेरी कृपा से जग यह सुन्दर।
रचना तेरी,सब हितकारी।।
धातु शास्त्र,वैमनिकी प्रवर्तक।
अभियांत्रिकी के,तुम्हीं पूजारी।।
वेद पुराण,शास्त्र,सब गाए।
शिल्प शास्त्र,तकनीक विचारी।।
नाना पंथ,धर्म,मत-वाले।
शरण गहे हैं,अंत तिहारी।।
हम अवगुणी,अल्प बुद्धि के।
सुन लो प्रभु,तुम हो अवतारी।।
देवों के तुम महादेव हो।
समझे ना,उनकी मती मारी।।
रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
सुंदरपुर वाराणसी-०५