अमन वो सकूं? कहां आज कल है।
(कविता)
लज्जत न दिखती,गुम आज सीरत,
दूषण का,फैला जहर आजकल है।
मुखिया सभी,आज दुखिया दिखे हैं,
उनका असर,बेअसर आज कल है ।
है पैसों के पीछे,पड़ी आज दुनियाँ,
मूल्यों की क़ीमत,नहीं आज कल है।
हैं दुःख से भरे वालिदैन,आज घर में,
अपनों का सुख,कहाँ आज कल है।
कहाँ रह गयी अब,वो जीवन सुरक्षा,
भरा हादसों से,सफ़र आज कल हैं।
खड़ी दिख रही,उस मुहाने पर दुनियाँ,
लड़ाई की सूरत,दिखे आज कल है।
है गंदी हुई,आज कितनी सियासत,
सच्चों की क़ीमत,कहाँ आज कल है।
अब क़लबो जिगर में,घुसी बेईमानी,
इमाँ की वो रोटी,कहाँ आज कल है।
अब फ़ैशनपरस्ती में,मशगूल दुनियाँ,
किरदार की बस,कमी आज कल है।
सबकी ये चाहत,सुधर जाए आलम,
स्वम् सब सुधरते,कहाँ आजकल है।
रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा ‘विज्ञ,सुन्दरपुर वाराणसी-221005