पुकार धरा की
(कविता)
धरती रोती, अम्बर रोता
रोते हैं,अब वन उपवन।
वायु प्रदूषित हुई,आज है,
खतरे में,सबका जीवन।।
क्यों इतनी,तपती है धरती,
आग उगलता,क्यों सूरज।
नदियां सूखी,घटते ग्लेशियर,
मौसम ने,बदली क्यों सूरत।।
हमने काटे हैं वृक्षों को,अब
कंक्रीट के बो रहें,जंगल।
अब कराहती है,मनवाता,
ख़तरे में,सारा भूमंडल ।।
प्लास्टिक है,जल स्रोतों में,
जलीय जीव सब हुए बेहाल।
धरती माँ की छाती,छलनी,
है विकास पर,यही सवाल ।।
सावन जो था अति मनभावन,
उसका मत पूछो अब हाल।
पृथ्वी का, बढ़ गया ताप है,
फागुन मास,हुआ बदहाल ।।
सोचें कैसी,प्रगति हमारी,
सर पर है,संकट की छाया ।
प्रकृति कुपित,अब दिखती है,
दावानल की,पसरी साया।।
अभी नहीं,जब हम चेतेंगें,
हरियाली,सम्बर्धन की बात।
गैस चैम्बर हो गई पृथ्वी ,
अम्लीय वर्षा,के हालात।।
अभी प्रदूषण,के कारण ही,
हुई विनष्ट,ओज़ोन परत ।
परा बैंगनी,किरणों के संग,
फ़ैल रहा है,त्वचा ज़हर ।।
यदि,अमंगल से बचना है,
धरती माँ की,सब सूनो पुकार।
बच्चे,बूढ़े और जवान मिल,
वृक्ष लगाकर करो श्रृंगार।।
रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
“विज्ञ”
सुन्दरपुर-वाराणसी,221005