आधुनिकता के दौर में मानव जीवन:एक अनुशीलन : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
आज आधुनिकता ने निःसंदेह मानव जीवन को आसान और सुविधाजनक बनाया है परन्तु इसने समाज पर गहरे और नकारात्मक प्रभाव भी छोड़े हैं।आज आधुनिकता के कारण जीवन मूल्यों और पारम्परिक व सामाजिक संरचनाओं में भी भारी बदलाव देखने को मिल रहा है।
निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि आधुनिकता की बदौलत,मानव जीवन में तकनीकी सुविधाएँ उपलब्ध हुई हैं परन्तु उसने बड़े अभिशाप भी दिए हैं जैसे पारिवारिक विघटन, शारीरिक मानसिक बीमारियां, सामाजिक व सांस्कृतिक अलगाव, नैतिक पतन ,चरित्रहीनता, पर्यावरण प्रदूषण और उपभोक्तावादी मानसिकता आदि।आधुनिकता ने आज हर तरफ़ रोशनी फैलाई है परन्तु मानव के हृदय को संवेदनहीन बना दिया।आज का मानव ज़्यादा साधन संपन्न हो गया है लेकिन उसके जीवन की शांति उससे कोसों दूर चली गयी।आज आधुनिकता के कारण हम निपट स्वार्थी व स्वकेंद्रित हो गए और उपभोक्तावादी संस्कृति के गुलाम बन गए हैं।हमारे आर्ष ऋषियों की वाणी थी”मनुर्भव:” यानि मनुष्य बनिये,मानव बनिये परन्तु आधुनिकता ने मनुष्य को मनुष्य बने रहने में कई बाधाएँ खड़ी कर दी है।आज हम सभी को बिजली पानी शिक्षा गति संचार सब कुछ प्राप्त हो गया है परन्तु परिवार छोटे हो गए संयुक्त परिवार एकाकी परिवार में बटते जा रहे हैं,जिससे संकट के समय में कोई कंधा देने वाला नहीं बचा।आज रिश्तों का बाज़ारीकरण हो गया हम रिश्ते उन्हीं से बना रहे हैं जिनसे कोई लाभ मिले फ़ायदा हो।आज फायदे के लिए रिश्ते बनाये जा रहें हैं अगर देखा जाए तो आज के रिश्ते डिस्पोजेबल सिरिंज के रूप में हो चले हैं ; यूज़ करो और फेंक दो।पहले विवाह एक पवित्र बंधन हुआ करता था आज एक तरह से अनुबंध में तब्दील हो चुका है।विवाह की पवित्रता कहीं छूमंतर हो गई।यही कारण है कि शादियां आज टूट रही हैं जबकि पुराने समय में शादियाँ जीवन पर्यंत चलती थीं।आज विचार करने की जरूरत है कि क्यों शादियों के बंधन टूट रहें हैं।
आज लोग आप की बात सुनते हैं कुछ और तरीके से,उसे दूसरों को समझानते हैं किसी और तरीके से और परिणाम निकालते हैं अपने तरीके से यह आधुनिकता का दौर है।
आधुनिक मानव भाग रहा है,गति बढ़ी है परन्तु गंतव्य का पता ही नहीं है।यह और कुछ नहीं प्रगति का विभ्रम ही है।आज मनन करें तो हम विकास के नाम पर विनाश की ओर अग्रसर हैं।वृक्षों की अन्धाधुँध कटाई,जंगलों की कटाई और कंक्रीट के जंगलों ने पृथ्वी के तापमान में वृद्धि कर दी है।कभी मिट्टी के घर हुआ करते थे जिसमें गर्मी में भी ठंडक मिलती थी;आज हम एसी कूलर में रहते हैं,परन्तु राहत नहीं है।पहले वायु की शीतलता थी परन्तु आज वायु प्रदूषण के फलस्वरूप मानव जीवन खतरे में पहुँच गया है।
आज बड़े नगरों की वायु गुणवत्ता ख़तरे के स्तर तक जा पहुँची है।आधुनिकता के नाम पर तो आज देखिए
शिक्षा और संस्कार का मानों भट्ठा ही बैठ गया है आज हम बच्चों को आधुनिक बनाने में लगे हैं।तभी तो बच्चों के नाम
जुलू जूली डब्लू मोना टीना इत्यादि नामकरण करते जा रहे हैं।उन्हें प्रणाम नमस्कार के स्थान पर टाटा बाई बाई सीखा रहे हैं।आज स्कूल कॉलेजेस में संस्कारविहीनता के पाठ पढ़ाये जा रहे हैं।बच्चों को जहाँ संस्कार की शिक्षा दी जाने की ज़रूरत है वहाँ आधुनिकता के नाम पर भौड़े संगीत की धुन पर नाच गाने की शिक्षा दी जा रही है।कभी महापुरुष हमारे बच्चों के आदर्श हुआ करते थे,आज फ़िल्मों के हीरो हीरोइनें बच्चों के आदर्श बन रहे हैं।तो चरित्र और संस्कार आयेगा कहाँ से? जो हमें बचपन में संस्कार सिखाए जाते हैं उनका ताउम्र प्रभाव देखने को मिलता है।आज के कालेज विश्वविद्यालय राजनीति की नर्सरी हो गए हैं।राजनेता वही से तैयार किए जा रहे हैं तो चरित्र आयेगा कहाँ से?
मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय जी का उदाहरण देना चाहूँगा वे अपने विश्व विद्यालय हेतु प्रवक्ता खोज खोज कर अन्य जगहों से लाते थे जहाँ उन्हें अच्छे व्यक्तित्व के लोग मिलते थे आज पैसे देकर भाई भतीजावाद और जाति देखकर प्रवक्ता नियुक्त हो रहे हैं तो जरा सोचिए उनसे गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की कल्पना की जा सकती है?कदापि नहीं।
अब आइए लोगों के आचरण में परिवर्तन देखें आज लोग दोहरे चरित्र में जी रहे हैं अपने लाभ के लिए अपना कानून और नुकसान पर दूसरा कानून।ऐसे भला आप सोचिए क्या समरसता लायी जा सकती है बिल्कुल नहीं।आज जातिवादी मानसिकता इतनी हावी हो चुकी है कि लोग जाति देखकर व्यवहार करने लगे हैं।आपसी भाईचारा बंधुत्व तार तार हो चला है।आज लोग कामना करते हैं कि देशभक्त पड़ोसी के घर पैदा हो हम अपने बच्चों को विदेशी शिक्षा दें और उनकी जरा आदर्श की बातें सुन लें तो आप के होश उड़ जाएँगे।
आधुनिकता के इस दौर में हम बच्चों को(प्रोसेस्ड फ़ूड) में मैगी मोमोज़ पिज्जा बर्गर और न जाने क्या क्या खिला रहे हैं तो भला उनका स्वास्थ्य और उनकी जीवन रक्षा प्रणाली कैसे सुधरेगी?क्या हम अपने बच्चों के स्वास्थ्य के हितैषी हैं या उनका भविष्य अंधकार मय बनाने पर तुले हैं;और दोष देते हैं समय का।क्या मूर्खतापूर्ण हमारा आचरण हो गया है।
मित्रो आज अगर आधुनिक खेती पर ध्यान दें तो हम पाते हैं कि हमने अपने खेतों में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करते करते उसे बंजर बना डाला है और कीड़ों की रोकथाम के लिए जो इंसेक्टिसाइड और पेस्टीसाइड का अंधाधुन्ध प्रयोग कर रहे हैं उससे लोगों में किडनी,हार्ट,लीवर के रोग और कैंसर जैसी भयानक बीमारियाँ पैदा हो रही हैं।माँ के दूध में भी डीडीटी पहुँच गया।कारण यही है कि हमारे वैज्ञानिक गला फाड़ फाड़ कर के कह रहे हैं कि मानवता की रक्षा के लिए अब हमे तत्काल जैविक खेती को अपनाना होगा अन्यथा हम गंभीर बीमारियों के शिकार होते चले जाएँगे जो परिलक्षित भी होने लगा है।
साथियों ! आधुनिकता साधन है,साध्य नहीं ।यदि हम सभी चाहते हैं कि मानवता बची रहे तो साध्य हमारा अच्छे मानव बनने का होना चाहिए।
आज आधुनिकता ने देह के सारे बंधनों से मानव को मुक्त कर दिया है।क्या खाना है,क्या पहनना है,कहाँ जाना है,पर मन को एक अजीब बंधन में बांध दिया है।
पहले देश मसल पॉवर से चला करते थे बीच के दौर में धन की शक्ति से संचालित होते थे आज डेटा और सूचनाओं की शक्ति से संचालित हो रहे हैं जिन देशों के पास जितने अधिक डेटा हैं वे ज़्यादा समृद्धशाली माने जा रहे हैं।आज कंप्यूटर और मोबाइल ने बेशक क्रांति ला दी है परन्तु मानवीय संवेदना कहीं खोती जा रही है।आज आधुनिकता के दौर में रील लाइफ में जीने को मजबूर होने लगे परन्तु रियल लाइफ से दूर हो चुके हैं।सोशल मीडिया ने हम सभी को नज़दीक तो ला दिया है परन्तु उतना ही हम भावनात्मक रूप से अपनों से दूर हो चले हैं।आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हमे सोचने समझने की शक्ति से भी महरूम कर चुका है।निश्चित तौर पर आज रोबोटिक पॉवर आई है परन्तु रोबोट माँ की गोदी नहीं बन सकता।किसी के दुख दर्द को नहीं महसूस कर सकता।वह एक यंत्र मानव भर है।
हमारी पीढ़ियाँ पैसों के पीछे भागती नजर आ रही हैं और प्रेम ममत्व वात्सल्य जो माँ पहले अपने शिशु को देती थी आज आधुनिक मायें अपने बच्चों को नहीं दे पा रही हैं।फलस्वरूप उनका बच्चा भी माँ को वो प्यार दुलार नहीं दे पा रहा है जो उसे देना चाहिए था।आप सोचे?यह आधुनिकता!हमे कहाँ ले जाएगी?
कुछ सकारात्मक बदलाव भी आधुनिक युग में,हम सभी ने देखें हैं जिसमें शिक्षा में नवाचार अनुसंधान और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में जीवन रक्षक प्रणालियों का विकास के अतिरिक्त अनेकानेक भौतिक संसाधनों की उपलब्धता,महिला सशक्तिकरण जैसे अनेक विषयों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है;पर वहीं आधुनिकता ने,पारिवारिक विघटन,शारीरिक मानसिक बीमारियाँ,तनावग्रस्तता अवसाद,नैतिक मूल्यों में गिरावट,चारित्रिक पतन,पर्यावरण विनाश,भावनात्मक अलगाव,सांस्कृतिक पहचान का संकट और पश्चिमी संस्कृति का प्रसार आदि नकारात्मक चीजें फैलायी हैं,जिस पर हमें ध्यान देने की ज़रूरत है अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब हम राक्षसी युग में प्रवेश कर जाएँगे।
लेखक:कई पुस्तकों का प्रणयनकर्ता, कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित, शिक्षाविद, वरिष्ठ साहित्यकार और वार्ताकार, वरिष्ठ प्रशिक्षक और प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है।
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