भारत के विवेक पूर्ण विकास में,पौर्वात्य और पाश्चात्य संस्कृतियों के संश्लेषण की महती आवश्यकता : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा

भारत के विवेक पूर्ण विकास में,पौर्वात्य और पाश्चात्य संस्कृतियों के संश्लेषण की महती आवश्यकता  : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा 
मानव के लौकिक पारलौकिक विकास के लिए किया जाने वाला आचार विचार ही संस्कृति है। कुछ मनीषियों का मानना है,कि भूषण भूत,सम्यक कृति ही संस्कृति है।संस्कृति का मतलब होता है,माँजकर चमकाया हुआ,सुधारा हुआ ,सिद्ध, सुनिर्मित, अलंकृत आदि। संस्कृति किसी समाज या समूह की जीवन शैली,उनके सोचने समझने के तौर तरीके और उनके सामूहिक मूल्यों का समग्र रूप है।इसमें मानव द्वारा अर्जित ज्ञान,विश्वास,कला, नैतिकता,क़ानून और रीति रिवाज शामिल होते हैं,जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते हैं।संस्कृति में खानपान,रहन सहन, पहनावा और उत्सव मनाने के तरीके,समाज के नैतिक नियम,आचार विचार और धार्मिक या सामाजिक विश्वास,अभिव्यक्ति,भाषा,साहित्य,संगीत,नृत्य और कला रूप जो समाज की पहचान बनाते हैं।जब कि संस्कार;किसी भी व्यक्ति,वस्तु में अन्य गुणों एवं योग्यताओं का आधान कराना ही संस्कार माना जाता है।संस्कार संपन्न मानव हृदय को दया करुणा अहिंसा मानवता आदर्श दान सत्य प्रेम उदारता त्याग बंधुत्व आदि गुणों से संपृक्त कराता है।मानव हृदय संस्कारों से ही विशाल व उदार बनता है।संस्कृति मानव में संस्कार पैदा कर उसे सुसंस्कृत करती है।
अब आइये! पौर्वात्य संस्कृति व पाश्चात्य संस्कृति पर ध्यान केंद्रित करें।पाश्चात्य और पौर्वात्य दो अलग अलग संस्कृतियों की धाराएँ हैं।एक की उत्पत्ति,यूनानी तर्क,औद्योगिक क्रान्ति तो दूसरे की उत्पत्ति,वेद उपनिषद और सामुदायिक जीवन से हुई है ।न कोई पूरी तरह से श्रेष्ठ है, न पूरी तरह से,त्याज़्य।
स्वामी विवेकानन्द जी ने १०० वर्ष पहले ही कहा था,कि हमें पश्चिम का विज्ञान और पूर्व के अध्यात्म की जरूरत है।पाश्चात्य सभ्यता संस्कृति,उन सामाजिक मानदण्डों,नैतिक मूल्यों,कला और राजनीतिक प्रणालियों का एक समूह है,जिनकी जड़े मुख्य रूप से प्राचीन ग्रीक और रोमन सभ्यताओं तथा ईसाई धर्म से जुड़ी है।यह यूरोप अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे देश के क्षेत्रों में व्याप्त है,और वैश्विकरण के माध्यम से आज पूरी दुनिया को प्रभावित कर रही है। इस संस्कृति के प्रमुख लक्षण और विशेषताएं है-व्यक्तिवाद और स्वतन्त्रता,इसमें समुदाय की तुलना में व्यक्तिगत पहचान,अधिकारों,स्वतन्त्रता और आत्म निर्भरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।दूसरा तर्कवाद और विज्ञान प्राचीन यूनानी दर्शन से प्रेरित होकर यह संस्कृति तर्क(logic)वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भौतिक प्रगति पर निर्भर करती है।तीसरी पूंजीवाद और भौतिकवाद,आर्थिक रूप से,यह मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था,औद्योगिकरण और जीवन स्तर को ऊँचा उठाने वाले भौतिक सुखों पर आधारित होती है।चौथी लोकतान्त्रिक मूल्य,राजनीतिक प्रणाली में,स्वतन्त्रता,समानता,मानवाधिकार और धर्म निरपेक्षता इसके मूल स्तम्भ हैं।पाँचवी खानपान और पहनावा,इसमें आधुनिक परिधानों(western dresses)और फ़ास्टफूड वाली संस्कृति की प्रमुखता होती है,जो आज वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय हो चुकी है।इस संस्कृति में समानता का आदर्श,क़ानून का शासन,वोट का अधिकार,सम्पत्ति का अधिकार,कैरियर की आज़ादी और वर्टिकल मोबिलिटी- जिसमें मज़दूर का बेटा भी CEO हो सकता है;और जीवन की प्रत्याशा को भी यह संस्कृति मॉडर्न चिकित्सा के द्वारा सम्भव किया है।
यही पर इस संस्कृति के दोषों पर भी चर्चा कर ली जाय! इस संस्कृति में अत्यधिक व्यक्तिवाद,अकेलापन,उपभोक्तावाद,रिश्तों में अस्थिरता,बाज़ारीकरण,स्त्री को एक प्रोडक्ट समझना,शरीर को वस्तु समझना और सामाजिक और सामुदायिक बन्धन कमज़ोर होना आदि इसके दोष में आते हैं।
अब आइये पौर्वात्य संस्कृति पर दृष्टिपात करें।यह संस्कृति चार मानदण्डों पर आधारित है।पहला अध्यात्मिकता और दर्शन,यह संस्कृति भौतिक सुखों के बजाय आंतरिक शांति कर्म के सिद्धांत,मोक्ष और निर्वाण पर आधारित होती है।दूसरा सामूहिकता,मैं से ऊपर हम को प्राथमिकता दी जाती है।परिवार समाज पारिवारिक एकता,बड़ों का सम्मान आदि पर ध्यान दिया जाता है।तीसरा पारम्परिक मूल्य और अनुशासन,नैतिक नियम,रीति रिवाज और सामाजिक और पारम्परिक मान्यताओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।चौथा प्रकृति से सामंजस्य,इस संस्कृति में मानव को प्रकृति का हिस्सा माना जाता है।भारतीय,चीनी,जापानी और मध्यपूर्वी संस्कृतियाँ पौर्वात्य संस्कृति के प्रमुख उदाहरण है।यह पाश्चात्य संस्कृति के बिल्कुल विपरीत होती है जो भौतिकवाद,व्यक्तिवाद और वैज्ञानिक तर्कवाद को ज़्यादा तरज़ीह नहीं देती।इसमे सामूहिक सामाजिक सुरक्षा कवच,कर्तव्य पहले अधिकार बाद में और इस संस्कृति में पूरी दुनिया को एक परिवार मानकर व्यवहार किया जाता है।जिसमें प्रकृति को माता माना जाता है।योग आयुर्वेद संयमित जीवन शैली और सामुदायिक बंधनों से युक्त होकर जीवन जीना इसकी विशेषता मानी जाती है,जिसमें हम माँ बाप को बोझ नहीं समझते,बच्चों को प्रोजेक्ट नहीं,जिम्मेदारी मानते हैं।स्त्री महिलाओं को देवी मानकर उनका सम्मान करते हैं।इस संस्कृति में ज़रूरत और लालच में फर्क समझ कर काम करना;त्योहारों पर सिर्फ़ शॉपिंग नहीं,समग्र जीवन दृष्टि अपनाकर,जीवन यापन करना,इसकी अतिरिक्त विशेषता मानी जाती है।
इस संस्कृति की जो कमियाँ परिलक्षित होती हैं वह जातिवादी सोच,स्त्री विरोधी नियम,सवाल पूछने की मनाही,धर्म का अतिरेक धर्मान्धता, छुआछूत ,दहेज ,कुरीतियों का बोलबाला,वैज्ञानिक तर्कवाद की कमी आदि कमियाँ इसमे शुमार हैं।
आज के भारत को दोनों संस्कृतियों ,सभ्यताओं से कुछ न कुछ सीखना चाहिए। हमें स्टीव जॉव्स वाला नवाचार,जुकरवर्ग वाली तकनीक,तो रामायण वाला भातृ प्रेम के साथ साथ संयुक्त परिवार वाला अपनापन, संविधान वाली बराबरी ,माता पिता देवो भव वाला संस्कार, आत्मसात करना चाहिए।यदि हम हद से ज़्यादा पाश्चात्य संस्कृति को अपनायेगें तो हम बिखर जाएँगे।हमें अपना दीपक स्वम् बन कर प्रकाश फैलाना पड़ेगा।न की पश्चिम की आँख मूँद कर नक़ल करनी है।न पुरानी हर प्रथा को गले ही लगाना है,जो पश्चिम बनेगा,वह जड़ विहीन बनेगा।जो पूर्व में अटका रहेगा वह विकास विहीन हो जाएगा।आज के दौर में असली विजेता वही होगा,जो दोनों संस्कृतियों का सार निकालकर अपनी प्रगति की राह तैयार करेगा।हमें आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता( आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस AI) वाला दिमाग़ चाहिए तो माँ का पैर छूने वाला दिल भी।हमें स्टार्टअप वाला हिम्मत भी चाहिए,तो दीवाली और होली वाली मिलनसारिता भी,तभी हम समन्वित रूप से आगे बढ़ सकते हैं।
लेखक: कई पुस्तकों का प्रणयनकर्ता, कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित, वरिष्ठ साहित्यकार, प्रमुख वार्ताकार, शिक्षाविद व प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है; जिसके नाम से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय में डॉक्टर डी आर विश्वकर्मा बेस्ट पेपर अवार्ड शोध छात्रों को प्रदान किया जाता है।

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