कायिक, वाचिक और मानसिक पापों को विनष्ट करने वाला पर्व गंगा दशहरा : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
सनातन संस्कृति की प्राण और भारत की आध्यात्मिक चेतना का आधार; भारत की जनभावना की प्रतीक;मां गंगा अपने अंतराल में प्राचीन सभ्यताओं और संस्कृतियों को संजोए हुए आज भी धार्मिक अनुष्ठानों के लिए एक अत्यंत ही पवित्र नदी के रूप में विख्यात है। कहते हैं कि भगवान विष्णु के चरण कमल से निकलकर, शिव जी की जटाओं में विश्राम करने वाली, सांसारिक दुखों के भवसागर से पार उतारने की क्षमता माँ गंगा में है। इसी कारण से गंगा दशहरा का पर्व प्रति वर्ष मनाया जाता है। गंगा दशहरा मां गंगा के धरती पर अवतरण दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। यह दिवस ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष को इस वर्ष २५/२६ मई को पड़ रहा है, जिस पर लोग गंगा में स्नान करेंगे। ऐसी शास्त्रीय मान्यता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से व्यक्ति को,दस पापों से मुक्ति मिलती है; यदि व्यक्ति सच्चे संकल्प के साथ,प्रायश्चित करते हुए गंगा में स्नान-ध्यान करे।मित्रों श्रद्धा से फल, पश्चाताप सहित, स्नान करने से चित्त भी शुद्ध होता है। श्रद्धावान लभते पुण्यम यानि श्रद्धा के द्वारा पुण्य प्राप्त किया जा सकता है। आदि शंकराचार्य ने कहा है कि बहिरंग की शुद्धि, अंतःकरण की शुद्धि के बिना व्यर्थ है।शास्त्र यह भी कहता है कि माँ गंगा में स्नान करना जन्म मरण के चक्र से छुटकारे की औषधि है। वह दिव्य दृष्टि देती है जिससे जीव को अपना पाप बोध होता है और वह अपने में सुधार लाता है। गंगाष्टकम में इस प्रकार वर्णित है-
( श्लोक-8 में कहा गया है कि “भेषजम भव रोगीणाम दिव्याम दृष्टिम प्रदातुमिशा”)।
स्कन्द पुराण काशी खण्ड 27,56:में यह भी उल्लिखित है कि यदि कोई व्यक्ति सैकड़ो योजन दूर से भी गंगा गंगा पुकारता है,तो उसके पाप नष्ट होते हैं।कारण गंगा नाम स्वम् में,तारक ब्रह्म है।शब्द ब्रह्म के रूप में वह चित्त को शुद्ध करता है।माँ गंगा को साक्षात भगवती का जलस्वरूप रूप माना गया है;जो मानवता का उपकार करती हैं।
पद्म पुराण के सृष्टि खण्ड 60,4:में वर्णित है-दर्शनात,स्पर्शनात, पानात तथा गंगेति कीर्तनात।पुनाति,पुण्यान,पुरुषान शत शोथ सहस्रशः।।
यानि गंगा के स्पर्श से शारीरिक पाप विनष्ट होते हैं,पान करने से, आंतरिक शुद्धि होती है,वाचिक पाप नष्ट होते हैं,और नाम कीर्तन से,अज्ञात जन्म जन्मांतर के पाप विनष्ट होते हैं।गंगा तीनों लोकों को पवित्र करती है।पाप का कोई स्तर हो श्रद्धा पूर्वक प्रायश्चित करते हुए स्नान से पाप विनष्ट होते हैं।यह हमारे शास्त्र कहते हैं।
गरुण पुराण के प्रेत खण्ड 35,12:में वर्णित है कि गंगा में अस्थि पड़ते ही जीव को पितृ योनि से मुक्ति मिल जाती है।राजा सगर के 60000 पुत्रों का नाश कपिल मुनि के श्राप से हुआ था जब भगीरथ ने तपस्या कर माँ गंगा को पृथ्वी पर लाए; तो उन सभी को स्वर्ग की प्राप्ति हुई।ऐसी मान्यता है।
वाराह पुराण में वर्णित है कि-यत्र गंगा महारस स देशस्तत तपोवनम् ।जिसका अर्थ होता है कि जहाँ गंगा होती हैं,वह स्थान तपोवन कहलाता है।इसी कारण से माँ गंगा को कल्याणकारिणी,मोक्षदायिनी,पापनाशिनी,पतितपावनी,एवं मंगलकारिणी कहा गया हैं। गंगा दशहरा पर स्नान करने से व्यक्ति को अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है,पितृ दोष का निवारण होता है,असाध्य रोगों में राहत मिलती है, गृह कलह समाप्त होता है, वस्तु दोष दूर होते हैं, मानसिक शांति मिलती है और जीवन में सात्विक ऊर्जा का संचार होता है। अब दशहरा का मतलब समझते हैं-दस मतलब दश और हरा का मतलब हरने वाली। यानि जो दश पापों को हर ले, उसे दशहरा कहते हैं। व्यक्ति तीन पाप शरीर से करता है वह है- चोरी, हत्या और निषिद्ध मैथुन में प्रवृत्त रहना।और वाणी से चार पाप करता है। वह है असत्य बचन, कटु वचन, निष्प्रयोज्य बकवास और चौथा पर निंदा करना।इसके अलावा तीन पाप मन से भी करता है। पहला परद्रोह दूसरा परद्रव्याभिलाषा और तीसरा किसी के अहित का लगातार चिंतन करना। इस प्रकार उक्त दस पाप भी गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान से दूर होते हैं।अब यदि कोई जान बुझ कर पाप कर्म करे और सोचे कि गंगा स्नान चल कर; कर लें तो माँ गंगा ऐसे का पाप नहीं धोती यह पक्का मान लीजिए।
गंगा भारत की राष्ट्रीय नदी है। यह भारत की अर्थव्यवस्था,पारिस्थिकी और सनातन संस्कृति,दर्शन की जीवन रेखा है।गंगा के जल में वैक्टीरियाफेज़ पाया जाता है जिसके कारण गंगा का जल कभी दूषित नहीं होता, सड़ता नहीं ।गंगा के जल में औषधीय गुण भी पाए जाते हैं;कहते हैं कि जो नियमित गंगा स्नान करते हैं; उन्हें त्वचा रोग नहीं होता। गंगा की जलोद मिट्टी काफ़ी उर्वर होती है यह कृषि के लिए भी वरदान साबित होती है। गंगा के पानी को सिंचाई के लिए और पेयजल के लिए भी महा नगरोंनगरों में इस्तेमाल किया जाता है। यह हजारों वन्यजीवों की प्यास बुझाने के काम भी आता है।गंगा के किनारे वर्षानुवर्ष कुंभ मेलों के आयोजन हर ६ वर्ष व १२ वर्षों पर होते हैं,जिन्हें अर्ध कुंभ और कुंभ मेला कहते हैं; जो आध्यात्मिकता का बहुत बड़ा केन्द्र होता है जहाँ पर करोड़ों श्रद्धालु स्नान के लिए आते हैं। इसीलिए माँ गंगा की निर्मलता अविरलता का ध्यान रखना हमारा सामूहिक परम कर्तव्य है।जिससे राष्ट्र नदी की गरिमा और पवित्रता बनी रहे।
लेखक: शिक्षाविद, प्रमुख वार्ताकार, साहित्यकार, कई पुस्तकों का लेखक, कई सम्मानों से विभूषित पूर्व प्रथम श्रेणी का अधिकारी रह चुका है।
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संपादकीय/ गंगा दशहरा