सूरदास पथ चल्यो 'अकेला'

सूरदास पथ चल्यो 'अकेला'

लालगंज प्रतापगढ़ : 

स्वामी करपात्री की धरती प्रतापगढ़ में यूँ तो अनेकों विद्वान हुए एवं हैं तथा अपनी लेखनी से साहित्य की श्रीवृद्धि कर रहे हैं।उन्हीं में एक नाम डाॅ0 रामसमुुझ मिश्र अकेला का भी है।यद्यपि अभी तक इनकी पाँच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं फिर भी इनमें लिखने का एक जुनून सा है।इन दिनों संत सूरदास जी की पद विधा पर चलकर उन्हों ने नई-नई कल्पनाएं की हैं तथा उन्हें शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत किया है।डाॅ0 अकेला ने अपने को पक्षी हारिल और कृष्ण को लकड़ी मानकर जो सृजन किया है वह अद्भुत और अवलोकनीय है--मुझ हारिल की लकड़ी कान्हा।
जइस राखिहौं वइसन रहिहौं,ना काहू सौं कुछ भी कहिहौं।
तुम जल मैं हैं मछरी कान्हा।।
   ऐसे ही ऊधौ से गोपियों का संदेशा भेजते हुए वे लिखते हैं----ऊधौ कह्यो स्याम सौं बतिया।
केहि अपराध कियो गोपिन संग हृदय विदारक घतिया।।
कउनो खोट प्रीति मा हमरी या टाले कोउ बतिया।
बिन बोले दै झांसा भाग्यो,फेर् यो हमसों अंखिया।।
    डाॅ0 अकेला ने एक नई कल्पना की है जिसमें कन्हइया दुल्हन के लिए रूठ जाते हैं।मां यशोदा उन्हें समझाती हुई कहती हैं-----
अब तो जिद छोड़ो गोपाल।
लाऊँगी मैं तुमहिं दुल्हनिया जा मेला तत्काल।।
रंग रूप कैसे हों उसके कैसे मुखड़ा गाल।
कैसी चाल वदन हो कैसा कैसे नयना बाल।।
    इसी प्रकार कान्हा एक दिन मां यशोदा से कहते हैं कि------
मइया गोपिन मोहिं चिढ़ावें।
तुम ना पूत नंद बाबा को कहि-कहि क्रोध बढ़ावें।।
नंद यशोदा दोनो गोरे,तुम कारे ना उनके छोरे।
पायो तुमहिं कहीं गलियन में हमको पड़ो बतावें।।
      ब्रज की गोपियां कन्हइया के छेड़ने पर कहती हैं -------
चुनरी छोड़ गोपाला मोरी।
गिर जायेगी सिर पर धारी दधि सों भरी कमोरी।।
ग्वाल बाल आवारा लेके,रोज गिराये धक्का देके।
आज गिरी तो ना छोड़ूँगी लेब खबरिया तोरी।।
   दूसरे पद में गोपियांँ मां यशोदा से कान्हा की शिकायत करती हुई कहती हैं-------
लाल तेरो मइया करत ढिठाई।
दीन्हो डारि धूरि भरि मूठी सूखय धरी खटाई।।
    इसी प्रकार कान्हा एक दिन अचानक मां यशोदा से पूँछ बैठते हैं कि-------
मइया कौन हमारो मामा?
कबहुँ गई ना लै संग मोको, सुनत हौं वे मथुरा के गामा।।
मात यशोदा हक्की-बक्की,पूँछी कौन पढ़ाया पट्टी।
वे तो नील गगन के राजा नाम है चंदामामा।।
       इस प्रकार डाॅ0 अकेला ने अपनी नवीन कल्पनाओं को पदों में संजोकर एक मिट रही विधा को सहेजने का जो अनोखा प्रयास किया है वह श्लाघनीय वंदनीय और अनुकरणीय है।

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