सद गुरु की महिमा
(शिक्षक दिवस, 5 सितंबर पर खास)
गुरु की महिमा सूर्य समान,उसने कब चाहा प्रतिदान।
अंध तमस की कारा तोड़ें।
मृत मृत्तिका,प्राण को जोड़े।
भ्रम विभ्रम का भांडा फोड़े ।
नव जागृति निर्माण करे वह,देकर के अवदान…गुरु की
बोता रहा ज्ञान का बीज ।
उपवन सजा रहा वह सींच
बोध का देकर अनुपम चीज।
ज्ञान अंकुरित होकर बनता,वट के वृक्ष समान…गुरु की
नमन तुम्हें हो शत शत बार।
ज्ञान दृष्टि का होता अम्बार।
जीवन नैया करता वह पार ।
अनगढ़ को बस सुगढ़ बनाना,है उसकी पहचान…गुरु की
सत मार्ग का दिया सहारा।
फैलाता अंतस उजियारा।
करुणा दया प्रेम सब सारा।
देता रहा जीवन में सबके,बन प्रदिप्त का बान... गुरु की
सदियों से वह ज्ञान प्रदाता।
होता है वह भाग्य विधाता।
ईश तत्व का बनकर ज्ञाता।
दिव्य चेतना और दर्शन का,देकर सबको ज्ञान... गुरु की
वाणी उसकी श्री का वास।
चरणों में सब तीर्थ निवास।
रहता है वह अक्खड़ उद्दात।
युग द्रष्टा और स्रष्टा बनकर, देता सबको मान…गुरु की
पाप विरत जीवन जीता है।
तप मार्ग पर वह चलता है ।
साथ पवित्रता,के रहता है ।
बन अहिंसक,वन्य जीवों का,करता भी कल्यान…गुरु की
रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा”विज्ञ”
सुन्दरपुर-वाराणसी-05
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संपादकीय/ शिक्षक दिवस