पट्टाभिषेक : अहंकार का विसर्जन और दायित्व का बोध, सत्य ज्ञान और त्याग का अभ्युदय : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा

पट्टाभिषेक : अहंकार का विसर्जन और दायित्व का बोध, सत्य ज्ञान और त्याग का अभ्युदय : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा 
पट्टाभिषेक किसी व्यक्ति को वैदिक मंत्रों अनुष्ठानों और पवित्र विधियों के साथ,किसी विशिष्ट धार्मिक आध्यात्मिक या अखाड़ों के पद पर विधिवत् रूप से स्थापित करने की पवित्र क्रिया को कहते हैं।सनातन परम्परा में पट्टाभिषेक से पहले पात्रता की परीक्षा के उपरान्त ही,किसी व्यक्ति,सन्त, महन्त,महामंडलेश्वर का पट्टाभिषेक करने का शाश्वत विधान है।
प्राचीन काल में,कुम्भ मेलों या अन्य विशेष अवसरों पर विभिन्न अखाड़ों में,सन्तों महन्तों और महामंडलेश्वरों के चयन और उन्हें पद भार सौपने की एक पवित्र परम्परा रही है।इसके माध्यम से,यह सुनिश्चित किया जाता है कि चयनित व्यक्ति सन्त महात्मा महामंडलेश्वर अखाड़े के नियमों परंपराओं और सनातन धर्म के प्रचार प्रसार का पालन करेगा।इसे पट्ट विभूषण संस्कार के नाम से भी जाना जाता है।
यह सिर्फ धार्मिक समारोह,पद सम्मान तक नहीं सीमित होता बल्कि एक आचार्य जो पूर्व में तप साधना संयम के साथ जो जिम्मेदारी संभाली थी;उसे दूसरे आचार्य तक पहुँचाने का पवित्र कार्य होता है। यह नए गुरुओं को यही से नया अध्याय शुरू करने का अवसर प्रदान करता है। जहाँ से पठन पाठन और स्वाध्याय द्वारा ज्ञानार्जन का अनवरत प्रयास होता है,जो सन्त को प्रमाणिक,अनुशासित और पावन बनाकर उसे पावन परम्परा का संवाहक बनाता है।
यहाँ पर एक कवि की चार पंक्तियाँ लिखना चाहूँगा- कि 
सब पुतले हैं हाड़ मांस के,अंतर्निहित भाव होता है।
कुछ उज्ज्वल आलोकित रवि सा, कुछ में कुछ दुराव होता है।
कोई दस्तावेज़ नहीं है, इसको परिभाषित करने का, सन्त व्यक्ति या वस्त्र नहीं है, वह तो बस स्वभाव होता है।।
अब आइये! पट्टाभिषेक का शाब्दिक मतलब समझें। सामान्यतः हम इसे,राजतिलक कह कर टाल देते हैं। यह अधूरा अनुवाद है। पट्टाभिषेक तीन शब्दों से मिलकर बना है। पहला पट्ट।दूसरा अभि और तीसरा षेक ।
पट्ट का मतलब होता है फैलाव विस्तार और अभि का मतलब चारों ओर से, सम्यक् रूप से पूर्ण और षेक का मतलब सींचना, नम करना और पिघलाना होता है। इस प्रकार पट्टाभिषेक का निहितार्थ उत्तरदायित्व के वस्त्र को चारों ओर से लोक कल्याण के जल से सींचकर, कठोर अहंकार को पिघलाकर कोमल बनाना।
कुछ मनीषी कहते हैं कि-पट्टम नहि भूषणम्,बंधनम् यानि पट्ट आभूषण नहीं बल्कि बन्धन है। कुछ विद्वान पट्टाभिषेक को राजत्व से ऋत्व तक की यात्रा को कहते हैं। राजत्व-पद, अधिकार, शासन और ऋत्व में यज्ञ,सत्य,धर्म का निर्वाह आता है।इस प्रकार पट्टाभिषेक पद अधिकार शासन या कुर्सी पाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि स्वम् को सत्य के लिए आहूत करने का एक यज्ञ होता है।
पट्टाभिषेक में व्यक्ति या सन्त अपने मय को,समाप्त कर हम यानि लोक से जुड़ता है।उसके मस्तक पर,बंधा पट्ट,उसके नेत्रों पर बंधी पट्टी नहीं होनी चाहिए,बल्कि उसमें दिव्यता की दिव्य दृष्टि होनी चाहिए,जिससे वह पूरे समाज को देखे।
पट्टाभिषेक तीन प्रकार का होता है।1-दैवी पट्टाभिषेक-इस प्रकार के पट्टाभिषेक में व्यक्ति पद,नहीं खोजता बल्कि पद व्यक्ति को खोजता है।जैसे राम का पट्टाभिषेक।
2-आसुरी पट्टाभिषेक-इसमें व्यक्ति बल पूर्वक,पद छीनता है जैसे रावण का पट्टाभिषेक 
3-मानुषी पट्टाभिषेक-इसमें व्यक्ति को पद मिल रहा हो, परन्तु वह उसे ठुकरा कर,धर्म के मार्ग का अनुसरण करता है।जैसे भरत का उदाहरण।
शुक्रनीति सार के अनुसार जब राजाओं का पट्टाभिषेक होता था,तो उसमें पाँच अनिवार्य तत्व होते थे इसके बिना पट्टाभिषेक अधूरा व अपूर्ण माना जाता था।पहला 7 नदियों 4 समुद्रों का जल। दूसरा मृत्तिका हाथी के दाँत से खोदी,घोड़े के खूर से उठी,तालाब के बीच की और सती के आँगन की मिट्टी।तीसरा औषधि-दुर्वा, अक्षत और दधि।चौथा शिल्प-स्वर्णकार द्वारा निर्मित मुकुट,बढ़ई द्वारा बनाया गया सिंहासन और लौहकार द्वारा निर्मित दंड।पाँचवाँ जन घोष,जिसे संस्कृत में “भद्र मस्तु”यानि प्रजा का आशीर्वाद।इस प्रकार से सिद्ध होता है कि राजा का अभिषेक देवता नहीं बल्कि प्रजा करती थी। इसीलिए ऋग्वेद में राजा के लिए कहा गया है कि-विश्वस्य जंतोः यानि राजा सभी जन का होता है।अथर्व वेद के राजसूय प्रकरण में कहा गया है कि राजा को प्रजा चुनती है।”त्वां विशो वृणताम राज्याय” पट्टाभिषेक उस चुनाव की स्वीकृति है।
पट्टाभिषेक से व्यक्ति में बदलाव आता है। पट्ट का भार जो समझता है,वह उसे व्यापार नहीं बनाता।सच्चा पट्टाभिषेक मस्तक पर मुकुट नहीं, मन में करुणा बाँधती है, ज्ञान की ज्योति जलाती है और त्याग का गुण सिखाती है।मित्रों राजा और कोई नहीं बल्कि सत्य ज्ञान और त्याग ही होता है।
आज के समय में पट्टाभिषेक का रूप बदल गया है। आज मतपत्र ही अभिषेक और संविधान ही पट्ट है, जब कोई सरपंच प्रधान विधायक या सांसद शपथ लेता है,तो वही उसका पट्टाभिषेक होता है।
आम जीवन में किसी अध्यापक का पट्टाभिषेक तब होता है,जब उसका शिष्य उससे आगे निकल जाए।किसी शिल्पी का पट्टाभिषेक तब होता है, जब उसकी बनायी हुई वस्तु उसके नाम से बड़ी हो जाए और एक लेखक का पट्टाभिषेक तब होता है, जब उसकी रचना लोक कंठ में बस जाए।
अतः सारांश में पट्टाभिषेक एक शिल्प, एक संस्कार और एक दर्शन है, जो अधिकार का प्रतीक नहीं बल्कि उत्तरदायित्व का भार है।

लेखक : कई पुस्तकों का प्रणयनकर्ता, कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित साहित्यकार, वार्ताकार एवं शिक्षाविद तथा प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है।

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