महाकाल से संवाद
किसी ने कहा—महाकाल हो आओ,
उसकी नगरी के चक्कर लगाओ।
तन-मन-धन सब अर्पित कर आओ,
किसी ने कहा—महाकाल हो आओ।।
मेरी आस्था के महकते गलियारे,
जिसमें डूबे मेरे मन के अंधियारें।
अपनी हर दुविधा सौंपकर तुझको, झुकाया शीश, चढ़ाया सब तेरे चरणों में,
अपनी हर दुविधा रख दी, बाबा तुम्हारे शरणों में।।
फिर भी रहा अँधेरा, न दिखा कोई रास्ता,
विचलित मन पूछे—कब थमेगा ये सिलसिला?
अब तो टूटी मेरी श्रद्धा तेरे दरबार से,
न रही कोई उम्मीद भगवान और संसार से।।
तभी अंतर्मन से आई आवाज़ —
“तू भटकता कहाँ है, मैं हूँ तेरे पास,
क्यों ढूँढ़ता है मुझे तू मंदिरों के आसपास?”
उम्मीद रख खुद पर, ये दौर भी गुजर जाएगा,
झाँक अपने अंदर , महाकाल वहीं मिल जाएगा।।
लेखक -
त्रिलोक गिरी गोस्वामी
बावा घठोली (बेमेतरा) छत्तीसगढ़
Tags:
संपादकीय/ कविता