प्रकृति का प्रकोप
प्रकृति को ज़्यादा,मत छेड़े
नहीं तो होगी,बहुत तबाही।
अभी हाल में,देखी दुनिया
देश नेपाल ने,दी है गवाही।
इसकी गोदी में,पलते सब
वट वृक्षों के संग भी,राई ।
आओ हम,मिल करे सुरक्षा
सभी पंथ के अपने भाई ।
प्रकृति फलक,बड़ा इतना
रहते यहाँ,सभी सुखदायी।
अम्लीय वर्षा,वायु प्रदूषण
प्रकृति प्रकोप,देती इठलाई।
आत्मीय बस,संभल जाओ,
बर्ना होगी,अति कठिनाई।।
रचनाकार: डॉ डी आर विश्वकर्मा
सुन्दरपुर वाराणसी