अन्तःकरण की शुद्धता;मानव को देवत्व प्रदान करने की आन्तरिक यात्रा : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा
अन्तःकरण की शुद्धता कोई चमत्कार नहीं; यह प्रतिदिन के स्नान जैसा है,जैसे शरीर को साफ़ रखने के लिए हम रोज़ स्नान करते हैं,वैसे ही अन्तःकरण को पवित्र करने के लिए प्रतिदिन तप ज्ञान सेवा व ध्यान की आवश्यकता होती है।
जिस प्रकार बाहरी दुनिया को देखने के लिए,हमे ईश्वर ने इंद्रियाँ प्रदान की हैं,वैसे ही भीतर की दुनियाँ के लिए मन बुद्धि विचार भाव चित्त अहंकार का एक सूक्ष्म तंत्र भी उपलब्ध कराया है।शास्त्र कहते हैं कि शुद्ध मन ही वह तीर्थ स्थान है;जहां ईश्वर आकर निवास करते हैं।यह मन ही है,जो मानव को,बन्धन और मोक्ष प्रदान करता है।”मन एव मनुष्याणाम कारणम बंध मोक्षयो:”कहते हैं कि जिसने अपने मन को जीत लिया है,वह स्वम् अपना मित्र और जिसने नहीं जीता वह स्वम् अपना सबसे बड़ा शत्रु है।मित्रों इस मन को जितने की प्रक्रिया का नाम है,अन्तःकरण की शुद्धता।यहाँ मैं आप को बताना चाहूँगा कि अन्तःकरण में मन के अलावा बुद्धि चित्त और अहंकार भी सम्मिलित है,जिसका वर्णन इसी लेख में आगे किया गया है।शंकराचार्य जी ने कहा है कि अन्तःकरण के शुद्धि के बिना ज्ञान टिकता नहीं है।हाँ एक चीज और शरीर तो मर जाता है,परन्तु आप का अन्तःकरण नहीं मरता।यह अगले जन्म में स्थानांतरित हो जाता है।अब आइये! अन्तःकरण के घटकों का सविस्तार वर्णन करें।अन्तःकरण में जैसा कि उपर हमने लिखा है कि चार चीजें आती हैं-मन बुद्धि चित्त और अहंकार तो सबसे पहले मन क्या है?इस पर ध्यान दें।साथियों मन कोई भौतिक बस्तु नहीं है,जिसे आप देख सकें या स्पर्श कर सकें।केवल इसे महसूस किया जा सकता है।यह मनोवैज्ञानिक घटनाओं विचारों भावनाओं स्मृतियों और चेतना का एक अमूर्त प्रवाह या समग्रता है।मनोवैज्ञानिकों ने इसके तीन प्रकार बतायें हैं पहला चेतन मन-वह है जिससे हम जाग्रत अवस्था में सोचते हैं,काम करते हैं और दुनियाँ से संवाद करते हैं।दूसरा अवचेतन मन-वह जहाँ हमारी पुरानी यादें आदतें व दबी हुई भावनाएँ होती हैं,जो बिना हमारे ध्यान के भी व्यवहार को प्रभावित करती हैं।तीसरा अचेतन मन-मन की वह गहराई जहाँ,दबी हुई भावनाएँ इच्छाएँ होती हैं और यही अजागृत प्रक्रियाएँ होती हैं।मन हमेशा संकल्प विकल्प में फँसा रहता है।सोचता है,यह करूँ,न करूँ,आदि।मन पल भर में हज़ारों मिल की यात्रा करके लौट आता है।यह अत्यन्त चंचल होता है।बुद्धि-मानव और पशु में केवल बुद्धि का ही अन्तर होता है।बुद्धि;मानव की वह मानसिक क्षमता है,जो उसे सीखने, अनुभव से लाभ उठाने,नई परिस्थितियों के साथ समायोजन करने,अमूर्त चिंतन करने और किसी समस्या का सही समाधान निकालने में मदद करती है।बुद्धि से ही नए ज्ञान और कौशलों को भी ग्रहण करने की क्षमता आती है,बदलते परिवेश में ख़ुद को ढालना,ऐसी चीजों और विचारों के बारे में सोचना,जो सामने मौज़ूद न हो,तर्क और सूझ बूझ के माध्यम से कठिनाइयों का हल निकालना भी बुद्धि का काम है।
बुद्धि का काम निर्णय करना,निश्चय करना,जैसे-मन कहता है खा लूँ,बुद्धि कहती है नहीं,आज तो व्रत का दिन है।गीता में बुद्धि को सारथी कहा गया,जो इन्द्रिय रूपी घोड़ों को,मन रूपी लगाम से संचालित करती है।मनीषियों ने बुद्धि को भी तीन प्रकार का बताया है।पहला सात्विक बुद्धि-यह आप को शांति प्रदान करती है।दूसरा राजसिक बुद्धि-जो धर्म,अधर्म को ठीक से नहीं पहचान पाती।इस प्रकार की बुद्धि लोभ में,धर्म को भी अधर्म समझ लेती है।राजसिक बुद्धि-इस प्रकार की बुद्धि आप को हमेशा तनाव देती है।झूठ बोल लूँ तो प्रमोशन मिल जाएगा,इस तरह की बुद्धि राजसिक बुद्धि में आती है।तामसिक बुद्धि-इस प्रकार की बुद्धि मानव को नीचे ले जाती है।जो अंधेरे को भी प्रकाश मान लेती है।अधर्म को धर्म समझ बैठती है।जब सभी चोरी कर रहें हैं,तो मैं भी कर लूँ की भावना इसमें होती है।बुद्धि को हम सात्विक आहार से,सत्संग से और अच्छी संगत से परिमार्जित करने में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।मनुष्य निरन्तर अभ्यास और अनासक्ति के माध्यम से अपने ग़लत आचरण विचारों को त्यागने में समर्थ होता है।अब आइये अन्तःकरण के तीसरे घटक चित्त पर ध्यान केंद्रित करें।
चित्त-चित्त मन का सबसे भीतरी हिस्सा है,जो स्मृतियों का, यादों का,भंडार होता है जो अनुभव की गई चीजों पुरानी यादों,संस्कारों को,संचित कर रखता है और चिंतन करता है।इसे मन का अंडरग्राउंड बेस भी कह सकते हैं।जहाँ हमारी इन्द्रियों द्वारा देखे सुने चखे और अनुभव किए गए नए सभी संस्कार सुरक्षित रहते हैं।चित्त,आप के अंदर का,एक तरह का आकाश है।आप इसे कंप्यूटर की तरह इसे हार्डडिस्क मान सकते हैं।जहाँ मानव के जन्म जन्मांतरों की यादें संस्कार डर इच्छाएं सब वहीं पड़ी रहती हैं।जैसे-किसी खास को देखकर प्रेम और नफ़रत की भावना इस लिए होती हैं कि चित्त में उससे जुड़ी पुरानी फाइलें खुल सी जाती हैं।चित्त में अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश(मृत्यु का डर)के साथ साथ पाँच वृत्तियाँ जैसे प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृति रहती हैं,जो हमारे चित्त को दिन रात नचाती रहती हैं।
अहंकार-अहंकार संस्कृति के शब्द अहम् से बना है।जिसका अर्थ मैं या ख़ुद के होने का भाव,मैं का भाव,जब व्यक्ति स्वम् को अपनी पहचान शरीर पद धन या उपलब्धियों से जोड़कर देखता है कि,मैं श्रेष्ठ हूँ या मैं हूँ भी का एहसास करता है,उसे अहंकार कहते हैं।ख़ुद को बाक़ी संसार से अलग मानना,मैं ही सबसे अच्छा और बुरा हूँ की सोच रखना अहंकार है।अहंकार स्वम् को सही साबित करने की कोशिश है। दूसरों की बात न सुनना और उन्हें अपने से कमतर समझना।विफलताओं और गलतियों की जिम्मेदारी न लेकर,दूसरों को दोष देना,पद धन यश और उपलब्धियों के बाद भी अंदर से असंतुष्ट और अशांत रहना।
अब आइए! मन में अशुद्धियाँ क्यों आती हैं?पर विवेचन करें ।वेदान्त में मन की तीन अशुद्धियाँ बतायी गई हैं ।पहला मल दोष-जिसमें पाप लोभ स्वार्थ हिंसा वासना आदि,यह मन की अशुद्धियाँ हैं,जिससे मुक्ति के लिए हमे बिना फल की इच्छा के सेवा करना चाहिए।दूसरा विक्षेप दोष-यह मन की चंचलता,एक विचार पर न टिकना।मन की चंचलता को जप तप ध्यान उपासना से और अभ्यास और अनासक्ति से मन को बश में किया जा सकता है।तीसरा अनावरण दोष-यह अज्ञान का पर्दा होता है।मैं नाम हूँ,मैं जाति हूँ,यह भ्रम मात्र है,इससे मुक्ति के लिए आत्म ज्ञान,आत्म विचार की जरूरत होती है।जब तक मन में मल विक्षेप और अनावरण दोष होता है जीवन में शांति असंभव होती है।
मन को शुद्ध करने के लिए शात्रों में चार सीढ़ियों का वर्णन किया है जिसे साधन चतुष्टय कहते हैं।पहला विवेक-से हम नित्य क्या है? क्या अनित्य है?का विचार करते हैं।क्या सदा रहेगा,और क्या चला जाएगा?पर विचार करना।मित्रों शरीर अनित्य है;जबकि आत्मा नित्य है।दूसरी सीढ़ी वैराग्य-की है।वैराग्य का मतलब संसार छोड़ना नहीं,बल्कि संसार में अनासक्ति को छोड़ना है।जिस प्रकार जल में कमल रहता है परन्तु उस पर जल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता वैसे ही संसार में रहना।मन को शुद्ध करने की तीसरी सीढ़ी-षट् सम्पत्ति है।1-शम यानि मन को भीतर की ओर मोड़ना,मन को शांत करना।2-दम यानि अपनी इंद्रियों को वश में रखना। 3-उपरति का मतलब मन को व्यर्थ के कार्यों से अलग रखना।4-तितिक्षा इसका अर्थ सुख दुख सर्दी गर्मी मान अपमान को सहन करना।5-श्रद्धा गुरुओं शास्त्रों और अपने आप पर विश्वास करना।6-समाधान यानि चित्त को एक लक्ष्य पर टिकाना एकाग्र करना।और मन को शुद्ध करने की चौथी सीढ़ी है मुमुक्षत्व प्राप्त करने की प्रबल प्यास जगाना कि अब बहुत कुछ हो गया अब बस मुक्त होना है।
अब आइये अंत में मन को शुद्ध रखने के कुछ व्यावहारिक उपाय पर विचार करें।आहार शुद्धि से,विचार शुद्धि से,वाणी शुद्धि से,जैसे-झूठ जुगली कटु वचन न बोलना और निष्प्रयोज्य बकवास ना करना आदि से।संग शुद्धि यानि अच्छों की संगत करना,कहते भी हैं कि जैसा संग वैसा रंग।एक और व्यावहारिक साधना जिसे आत्म निरीक्षण कहते हैं को,अमल में लाकर हम अपने मन को निर्मल बनाने में सफल हो सकते हैं।प्रतिदिवस सायं विस्तर पर जाने के पहले चिंतन करें कि मैंने आज किस पर लोभ किया,किस पर क्रोध किया, किस को अनावश्यक परेशान किया, किस को डाटा,किस पर नकारात्मक सोच रखी आदि से, हम अपने मन को शुद्ध करने में सफल हो सकते हैं।
लेखक:आध्यात्मिक चिंतक, वार्ताकार , साहित्यकार, शिक्षाविद एवं प्रथम श्रेणी का पूर्व अधिकारी है।