बासन्तिक मधुमास
शस्य श्यामला हुई धरा है ले स्वर्णिम सौगात।
रंग रचाती दिखे प्रकृति भी,दे अनंग को मात ।।
पंचम स्वर में गाये कोयल,घनी अमराइ बीच ।
बासंतिक आभा बिखेरती,प्रकृति देय आशीष।।
पीत पुष्प धानी चादर से सजी धरा की आन ।
पीत रंग सौभाग्य जगाये कहते सबुध सुजान ।।
पागल हो सब भृंग नाचते ले कलियों का साथ ।
प्रकृति सभी सीमाएँ तोड़े,पकड़ मदन का हाथ ।।
नव प्रस्फुटित सुमन शोभित बन प्रकृति यौवन ।
आनंदित थल चर नभ चर,प्रमुदित नील गगन।।
सबके मन भावों को हर्षित करता है मधुमास।
सुषमा की बंशी है बाजे नव किसलय के रास ।।
रात्रि चंद्र ज्योत्सना बिखरती सुबहे मलय पवन।
खिलते दीखते पुष्प पलाश के जैसे दावानल ।।
चेतन मन भी है बौराया,पाकर अमित आनन्द ।
प्रकृति पर्व बना मदनोत्सव,जीवन नन्दन वन ।।
पुष्पाभूषण से आभूषित वसुधा हुई निहाल ।
मधुर पर्व में सबकी मानो मदमाती मय चाल ।।
रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा”विज्ञ”
सुन्दरपुर वाराणसी-२२१००५