आदि शक्ति है, माँ ! (कविता)

आदि शक्ति है, माँ ! (कविता)
माँ ही तो वह केन्द्र बिन्दु है,
समझाती जीवन का सार।

माता के ही रक्त मांस से,  
पाता शिशु पोषण आहार।             

वही धरा की अनुपम कृति,
ईश्वर की है दिव्य अवतार।               

जननी सबकी वही मातु है,
देवों को भी दी है आकार।               

पीढ़ी दर पीढ़ी पहुंचाती, 
सदियों से बहु विधि संस्कार।                  
सोचें जरा हम चेतन मन से, 
किससे बनता जीवन साकार।          

सारे रिश्ते नाते बनते , 
जोड़े हैं माँ जीवन के  तार ।
                    
इसीलिए तो करते सबही, 
सर्वप्रथम, माँ से ही प्यार ।                

जब भी पड़े हैं हम गर्दिश में,  
देती है वह प्रेम दुलार।           

मेरे साथी भ्रम ना पाले, 
सबसे बढ़कर शक्ति अपार।                
माइटोकंड्रियल डी एन ए देती,     
अद्भुत शक्ति का जो भण्डार ।  

सभी स्त्रियां केवल माँ से,  
पाती हैं यह,जीवन का हार ।               
वैज्ञानिक शोधों ने पाया, 
 माँ आदि शक्ति आगार।                

वेद शास्त्र और हिन्दुइजम,
माने माँ को माँ का आधार ।।             

माँ की ममता के सुगंध से,     
मानवता का हुआ उपकार ।।        

रचनाकार :  डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा ”विज्ञ” सुन्दरपुर वाराणसी

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