अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष आलेख, शिखा : संघर्ष, साहस और साहित्य की जीवंत मिसाल

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष आलेख
शिखा : संघर्ष, साहस और साहित्य की जीवंत मिसाल
अगर यह कहा जाए कि शिखा मौत से जूझकर साहित्य की सेवा के लिए फिर से लौट आई हैं, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इतनी सरल, हंसमुख और संघर्षशील लड़की के जीवन में इतने उतार-चढ़ाव, दुख और संघर्ष आएँगे—यह सोचकर भी रूह कांप उठती है।

शारीरिक रूप से असमर्थ होते हुए भी शिखा की बुद्धि अत्यंत कुशाग्र और तीव्र है। यह कहना बिल्कुल उचित होगा कि शिखा एक बहुमुखी प्रतिभाशाली युवा साहित्यकार हैं।
साहित्य की लगभग हर विधा पर उनकी मजबूत पकड़ है—चाहे वह कविता हो, आलेख हो, लघुकथा हो या कहानी लेखन। उनकी हर रचना पाठकों को इतना प्रभावित करती है कि पढ़ने वाला यही सोचने पर मजबूर हो जाता है कि इससे बेहतर अभिव्यक्ति शायद ही संभव हो।

दरअसल उनकी प्रतिभा में ईश्वरीय कृपा का विशेष प्रभाव दिखाई देता है। जो लड़की बिना सहारे के चल-फिर नहीं सकती, कहीं आ-जा नहीं सकती—उसे ईश्वर ने इतनी अद्भुत सृजन शक्ति दी है। सच में यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगता।
इतना ही नहीं, शिखा में लेखन के साथ-साथ अद्भुत प्रबंधन क्षमता भी है। शारीरिक चुनौतियों के बावजूद वे किसी भी कार्य का संचालन और आयोजन अत्यंत दक्षता से कर लेती हैं।

इस युवा साहित्यकार के बारे में जितना लिखा जाए उतना कम है। बस इतना ही कहा जा सकता है कि शिखा को जितना जाना, वह अभी भी कम ही जाना।
मेरी दिल से दुआ है — तुम जियो हजारों साल और अपने संघर्ष तथा साहित्य से समाज के लिए प्रेरणा और मिसाल बनो।

डॉ. शिखा गोस्वामी “निहारिका” का संक्षिप्त परिचय

डॉ. शिखा गोस्वामी “निहारिका” का जन्म 14 नवंबर 1995 को रायपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ।
उनके पिता श्री कमल गिरी और माता श्रीमती रेखा गोस्वामी हैं।
उनके दादाजी महंत शिवशरण गिरी गोस्वामी तथा दादी श्रीमती प्रीति देवी गोस्वामी हैं।

शिखा अपने परिवार में सबसे बड़ी हैं। उनका मूल निवास मारोगढ़, जिला बेमेतरा (छत्तीसगढ़) है, जबकि वर्तमान में वे ग्राम चंद्रखुरी, जिला मुंगेली (छत्तीसगढ़) में निवास करती हैं।


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शिक्षा और साहित्यिक यात्रा

डॉ. शिखा गोस्वामी पिछले 7 वर्षों से साहित्य जगत में सक्रिय हैं। वे एक कवयित्री, लेखिका और साहित्यकार होने के साथ-साथ रिपोर्टर और समीक्षक भी हैं।

वर्तमान में वे सामाजिक बाल एवं महिला विकास संस्था (मकस), झारखंड में सूचना प्रभारी

यूथ फेडरेशन छत्तीसगढ़ में राज्य संयोजक के रूप में कार्यरत हैं।

उन्होंने कविता, कहानी, लघुकथा, संस्मरण, छंद, आत्मकथा और विभिन्न साहित्यिक विधाओं में उत्कृष्ट रचनाएँ प्रस्तुत की हैं।

अब तक उनकी 9 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं — जिनमें 5 एकल पुस्तकें और 4 साझा संकलन शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त उनकी रचनाएँ 50 से अधिक साझा संकलनों और कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।


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प्रकाशित पुस्तकें

1. कुछ भीगे अल्फाजों में (कविता संग्रह)


2. वजह मिल गई (लघुकथा संग्रह)


3. निहारिका की प्रेरक कथाएँ (कहानी संग्रह)


4. आकांक्षी (उपन्यास)


5. Aspirant (उपन्यास)


6. मेहंदी हाथों की (साझा संग्रह)


7. निर्भया सांझ (साझा संग्रह)


8. उपवन (साझा संग्रह)


9. गिरिराज नंदनी गिरिजा (साझा संग्रह)



इसके अलावा वैदिक प्रकाशन की कई पुस्तकों में भी वे प्रमुख सक्रिय लेखिकाओं में से एक हैं।


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सम्मान और उपलब्धियाँ

साहित्य और मंच संचालन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें प्रमुख हैं—

वक्ता मंच सम्मान – रायपुर

सावित्रीबाई फुले अवार्ड – सरगांव

वीर जवान अवार्ड – उदयपुर

प्रांति इंडिया अवार्ड – बिहार

यूथ फेडरेशन सम्मान – राजस्थान

फिल्म फेस्टिवल अवार्ड – कोंच

INTERNATIONAL ICON AWARD (2024)
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्य और समाज सेवा में उत्कृष्ट योगदान के लिए।

WOMEN'S ICON AWARD (2025)
महिला सशक्तिकरण और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए।

हाल ही में उन्हें काशी हिंदी विद्यापीठ, वाराणसी द्वारा साहित्यिक योगदान के लिए “विद्या वाचस्पति” मानद डॉक्टरेट उपाधि से सम्मानित किया गया है।


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प्रेरणा और पहचान

शिखा गोस्वामी को बचपन से ही पढ़ने-लिखने का गहरा शौक था। यही रुचि आगे चलकर साहित्य सृजन का माध्यम बन गई। समय के साथ उनकी लेखनी को व्यापक सराहना मिली और आज वे साहित्य जगत में एक प्रेरणादायी नाम बन चुकी हैं।

उनका जीवन संघर्ष, दृढ़ निश्चय और साहित्य सेवा का जीवंत उदाहरण है। वे अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को निरंतर प्रेरित कर रही हैं और साहित्य जगत में अपनी पहचान को और सशक्त बना रही हैं।

डॉ. श्याम कुंवर भारती
प्रधान संपादक
कहानिका हिंदी पत्रिका
बोकारो, झारखंड

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