प्रणाम/नमस्कार (कविता)

प्रणाम/नमस्कार (कविता)
है प्रणाम,  समर्पण मित्रों,
दर्शाता है, उच्च सम्मान ।
नमस्कार और प्रणाम से, 
हम करते, दूजे का मान।।

दोनों में, हम सन्मुख के,
आदर पूर्वक झुकते ।
नमस्कार का मतलब है,
हम गुमान नहीं करते ।।

नमस्कार और है प्रणाम,
संस्कृति की परिपाटी ।
दोनों के करने से मिलता 
प्रेम आशीष की थाती ।।

श्रद्धा और समर्पण करते 
दोनों में अगुआई।
पूरी दुनिया एक कुटुंब है,
मर्म समझ लो भाई ।।

आदर संग सुविचार भी, 
है प्रणाम बर्बस लाता ।
आदर देने से,पत्थर दिल,
नरम, पिघल सा जाता ।।

पंचांग से, करती स्त्रियां, 
अपनों का झुक मान ।
करते हैं, अष्ट अंग से,
पुरुष, दूजों का सम्मान ।।

जानु बाहु शिर वचन बुद्धि,
है ,पंचांग यह साधन ।
करती हैं,  जिससे स्त्रियां,
बड़े बुज़ुर्ग का, अभिवादन ।।

अष्टांग से, करता प्रणाम है, 
अपना पुरुष समाज ।
जानु बाहु शिर वचन वक्ष, 
बुद्धि दृष्टि, हस्त को साज।।

अपनी रीति, सदा दूजों का,
करना है अभिवादन ।
नमस्कार प्रणाम द्वय से 
आता है, आत्म अनुशासन।।

रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा 
          "विज्ञ” सुन्दरपुर वाराणसी-05

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