तुम्हें देख हुआ अंकुरित प्रणय (कविता)
अज्ञात मलय के झोंको सा,
अदभुत सिहरन सुरभित हर लय।
कब और कैसे किस हालत में,
तुम्हें देख हुआ अंकुरित प्रणय।
यह प्रणय ही तो जीवनाधार,
सृष्टि का मूल उद्गम स्थल।
जो आकर्षक बहुत मनोरम है,
बिन इसके होता सिर्फ़ मरुस्थल।
प्रणय की हार कभी ना होती,
इसको मिलती सदा विजय।
तुम्हें देख हुआ अंकुरित प्रणय।
आनंदित हर पल भरे हिंडोले,
अनंत राज़ हृदय के खोले।
ना जाने कब किस हालत से,
गुजरे और खाए हिचकोले।
सब कुछ लगे कल्पना विचरण सा,
सारे कष्टों का कर गया क्षय।
तुम्हें देख हुआ अंकुरित प्रणय।
कवि- चंद्रकांत पाण्डेय,
मुंबई, महाराष्ट्र
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