माँ ( मातृ दिवस पर विशेष)

माँ ( मातृ दिवस पर विशेष) 
ममता की साक्षात मूर्ति, 
माँ तो बस माँ होती है। 
खुद डाँटकर बच्चों को, 
तनहाई में रोती है।

कभी-कभी खुद भूखी रह, 
औलाद हित जी लेती है। 
पिता भी साथ नहीं दे तो,
अकेले ही जीवन देती है।

लाखों कवि शायरों ने,
माता का गुणगान किया। 
देव और संत मुनियों ने, 
लाखों बार बखान किया।

लगता नहीं माँ के प्यार का, 
वर्णन करना संभव है। 
एक नहीं लाखों कवियों से,
प्रशस्ति सर्वथा असंभव है।

ऋण चुकाना ममता का, 
हम सबके बस की बात नहीं। 
कोई सामान्य क्या अदा करेगा, 
मातृ भक्तों की औकात नहीं।

माँ जैसी प्यारी कोई नहीं, 
न उनके ममता का कोई अंत। 
स्वार्थ युक्त सभी का प्यार,
बस माँ का प्यार,जग में अनंत।

कोई विकल्प नहीं धरा पर, 
"माता"की समता में कौन? 
देख कष्ट में निज संतति को, 
माँ नहीं रह सकती मौन।

माता -पिता  हैं देवसम, 
इनके हम परअगणित उपकार। 
अदा करो ऋण अतुलनीय, 
अब बनकर श्रवण कुमार। 

कवि - चंद्रकांत पांडेय,
मुंबई/ महाराष्ट्र,

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