सच्चा जीवन दर्शन
(कविता)
अंतःकरण, पवित्र बने बिन,
प्रभु से, सच्चा प्यार न होगा ।
पाप कर्म में, रमे रहोगे तो,
जीवन का, उद्धार न होगा ।।
मन कल्मष कलुषित है तो,
प्रभु,सच्चा फिर यार न होगा।
भक्ति केवल, बने दिखावा,
प्रभु का वह, दरबार न होगा ।।
तीन पहर , पूजा करने से,
ईश्वर का, दीदार न होगा।
प्रभु हैं, केवल भाव के भूखे,
भाव बिना, अवतार न होगा।।
पापाचार में, यदि रत जीवन,
शांति का, उद्गार न होगा।
निर्मल दृष्टि, भाव सुखद बिन,
बेहतर तेरा, संसार न होगा ।।
चाहे कितना, कीर्तन कर लो,
जीवन सहज, साकार न होगा ।।
कर्मों की शुचिता, यदि न हो,
आत्म से, साक्षात्कार न होगा ।।
वचन तुम्हारा, मधुमय न हो,
जीवन का, व्यापार न होगा ।
बिन वाणी, अमृत रस टपके,
हृदय करुण, आगार न होगा।।
परहित में, यदि जीवन गुज़रे,
जीवन तेरा, भार न होगा ।
यश कीर्ति, अनुदिन फैलेगी,
जीवन पुष्प में, खार न होगा ।।
रचनाकार: डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा ”विज्ञ”
सुन्दरपुर वाराणसी-05