जीवन को सार्थक बनाने के लिए जीवन में शुभता को धारण करें : डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा

जीवन को सार्थक बनाने के लिए  जीवन में शुभता को धारण करें :  डॉक्टर दयाराम विश्वकर्मा 
मित्रों ! जब कोई विचार,वस्तु,समय,या कार्य हमारे जीवन में सकारात्मकता सुख और समृद्धि लाता है तो उसे शुभ और उसमें शुभता का वास माना जाता है।शास्त्रों में शुभ शब्द का मूल”शु” धातु से उत्पन्न है,जिसका मतलब चमकना,पवित्र होना,जो कल्याण कारी हो,मंगल मय हो।और शुभता शुभ शब्द में”ता” प्रत्यय लगने से बनता है।जिसका अर्थ मंगल मय,कल्याणकारी,पवित्रता,अच्छाई और अनुकूलता से लगाया जाता है।शुभ और शुभता वह है,जो चित्त को निर्मल करे,समाज को जोड़े और दैवीय शक्ति के निकट लाए वही शुभ,शुभता पूर्ण कार्य,कर्त्तव्य कहलाता है;जिसके करने से अपना और सबका मंगल होता है।
शुभता के कई प्रकार हैं।जैसे- वैचारिक व मानसिक शुभता-सकारात्मक सोच,मन में अच्छे विचार रखना,दूसरों के प्रति दया करुणा और प्रेम का भाव रखना।कर्म और आचरण की शुभता-नैतिक कार्य ईमानदारी से करना,सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना,परोपकार करना,निःस्वार्थ भाव से,दूसरों की मदद करना और समाज में सकारात्मक योगदान देना भी शुभता के अन्तर्गत आता है।वातावरण और प्रतीकों की शुभता-घर या कार्य स्थल पर शांति स्वच्छता पवित्रता के होने से भी शुभता प्रकट होती है।भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक कलश दीपक और आम के पत्तों के बंदनवार भी शुभता के प्रतीक माने जाते हैं,जो नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर,सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं।समय की शुभता-सही समय से किसी कार्य को करना व्यापार विवाह या नए गृह में प्रवेश के लिए ऐसा समय चुनना जब ब्रह्मांडीय ऊर्ज़ाएँ अनुकूल हों,ताकि कार्य बिना किसी बाधा के सफल हो।शुभता-वह दिव्य शक्ति या ऊर्जा है,जो हमारे जीवन से अंधकार दुख नकारात्मकता को मिटाकर प्रकाश शांति और समृद्धि का संचार करती है।शुभता संस्कार माँगती है,इससे धन से कुछ लेना देना नहीं।एक रोटी में आधा किसी भूखे को खिला कर खाना यज्ञ है,और करोड़ों का दान अहंकार के साथ करना एक बंधन ही होता है।शुभता आती है जब हम सभी के संकल्प सात्विक हों,सबके कल्याण की भावना से कोई कार्य किया जाए।
मित्रों!शुभता को चार स्तर पर विभाजित किया जा सकता है 
1-कायिक शुभता,यह शरीर से होती है।जैसे माता पिता की सेवा करना,जीवों की सेवा करना,वृक्षारोपण,उपयुक्त को दान देना,पुण्य कर्म करना,स्वच्छता रखना,साफ़ सफ़ाई। जिसमें शुचिता,अन्न की शुद्धता व सात्विक आहार,श्रम की शुभता,निद्रा व ब्रह्मचर्य,किसी की सेवा और मदद करना,सही मुद्रा व वेश धारण करना और तीर्थों के समान अपनी काया को पवित्र रखना आदि कायिक शुभता के उदाहरण हैं।
2-वाचिक शुभता,सत्य बोलना,मधुर बोलना,प्रिय बचन,सद साहित्य का अध्ययन।कहते हैं कि वाणी ब्रह्म का रूप होती है और आचार्य दण्डी ने कहा भी है की०बाचामेव प्रसादेन लोक यात्रा प्रवर्तते”यानि वाणी के प्रसाद से ही हम सभी की भौतिक क्रियाएं पूरी होती हैं।अतः वाणी से सत्य प्रिय हितकारी और मधुर बोलना चाहिए।कभी किसी की निंदा चुग़ली व्यंग नहीं बोलना चाहिए ना करनी चाहिए।कहते हैं कि कटु वचन पूरे जीवन की तपस्या नष्ट कर देता है।
3-मानसिक शुभता,योग वशिष्ठ में कहा गया है-कि”मन एव मनुष्यानाम कारणम बंध मोक्षयो” तात्पर्य मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है,इसीलिए मानसिक शुभता सबसे बड़ी चीज होती है।सबके कल्याण की कामना करना,ईर्ष्या द्वेष क्रोध से दूर रहना,संतोष की भावना रखना,अपने से बड़ों के प्रति श्रद्धा रखना,लोगों के प्रति क्षमा का भाव रखना,शुभ संकल्प करना आदि इसमें समाहित है।
4-आध्यात्मिक शुभता,यह आत्मा से किया गया कार्य जैसे जप तप तीर्थाटन,ईश्वर स्मरण,ईश्वर प्राणिधान।इसमें यह सोचना कि हम कर्ता नहीं,केवल दृष्टा हैं।शरीर कर रहा है,वाणी बोल रही है,मन सोच रहा है,मैं तो केवल देख रहा हूँ।जिस दिन से साक्षी भाव आ जाएगा उसी दिन से अशुभता आप को छू नहीं पाएगी।इसमें ईश्वर के समक्ष समर्पण,मेरा कुछ नहीं,सब उसका ही दिया हुआ है।एकतत्व भाव होना जैसे सबमें वही ब्रह्म की सत्ता विद्यमान है।आनन्दभाव में रहना-बिना कारण के आनन्दित रहना और महसूस करना कि मैं देह नहीं,मैं वाणी नहीं,मैं मन नहीं,मैं तो वह प्रकाश हूँ जो इन सबको देख रहा है।अहम् ब्रह्मास्मि।
हमारे ऋषियों ने शुभ व शुभता को एक घटना नहीं,एक अभ्यास माना है।मानव रोज के विधान से शुभता गढ़ सकता है।शुभता को आत्मसात् करने के 7 सनातन विधान बताए गए हैं।1-प्रातः स्मरण का विधान,सुबह उठते ही हथेलियों को देखना और संकल्पित होना कि दिन भर मैं शुभ करने का विधान बनाये तो अशुभता आ ही नहीं सकती।
2-शुचिता का विधान-बिना स्नान के भोजन नहीं करना चाहिए।साफ़ वस्त्र धारण करना चाहिए।घर में सामान बिखरे नहीं होने चाहिए,अन्यथा यह सब अशुभता को आमन्त्रित करते हैं।साथियों घर और शरीर की पवित्रता ही शुभता की पहली पहचान होती है।3-वाणी का विधान,दिन में एक बार भी कटु वचन,गाली,चुग़ली,झूठ दिन भर की शुभता को खा जाता है।हमारे मनीषियों ने बताया है कि सत्य भी वही बोला जाय,जो प्रिय हो।जो व्यक्ति वाणी पर संयम रखता है,उसके पास लक्ष्मी का वास होता है।4-अन्न का विधान,जिस घर में अन्न का अनादर होता है,जहाँ जूठा फेंका जाता है,जहाँ भोजन करते समय कलह होता है,वहाँ शुभता नहीं टिकती।5-कर्म का विधान,अपने कार्य में कौशल लाना ही सबसे बड़ी पूजा है।कर्म में ईमानदारी ही शुभता का बीमा है।6-संग का विधान,कहते हैं कि जैसी संगति वैसी मति,दुर्जन का साथ,अश्लील दृश्य,निंदा सुनना यह सब अशुभ के लिए खाद पानी का काम करता है।7-दान का विधान,अपनी कमाई का दशांश दान देने के लिए उद्दत होना चाहिए।चाहे ज्ञान का हो,धन का हो,समय का हो इसे दूसरों में बाँटना,शुभता को स्थायी करता है।

लेखक: कई पुस्तकों के प्रणयन कर्ता,कई राज्य स्तरीय सम्मानों से विभूषित वरिष्ठ साहित्यकार, वार्ताकार,शिक्षाविद और अवकाश प्राप्त प्रथम श्रेणी का अधिकारी है।

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